प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष – शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर | अध्याय 3 : राज गिद्ध का पहला हमला

 

प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष – शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर | अध्याय 3 : राज गिद्ध का पहला हमला

प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष

शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर

अध्याय 3– राज गिद्ध का पहला हमला

भूमिगत नगर “जीवन रक्षा” के भीतर अभी-अभी नव मानव आर्य का जागरण हुआ था। प्रयोगशाला में उपस्थित सभी लोग अभी उस अद्भुत घटना से उबर भी नहीं पाए थे कि अचानक पूरे नगर में चेतावनी के सायरन बज उठे।

लाल रंग की चेतावनी लाइटें गलियारों में चमकने लगीं।

एक सैनिक तेजी से दौड़ता हुआ नियंत्रण कक्ष में पहुँचा।

“महाराज शिवा! बाहरी चौकी नंबर सात से संदेश आया है।”

शिवा ने तुरंत आदेश दिया—

“संदेश प्रसारित करो।”

दीवार पर लगे विशाल स्क्रीन पर एक टूटता-फूटता दृश्य दिखाई देने लगा। वह दृश्य पृथ्वी की सतह पर बने एक छोटे गुप्त बंकर का था। वहाँ तैनात सैनिक घबराए हुए थे।

अचानक कैमरे के सामने आकाश अंधेरा हो गया।

फिर एक विशाल छाया दिखाई दी।

वह था — राज गिद्ध

उसके पंख इतने विशाल थे कि उसके उड़ते ही चारों ओर धूल और राख का तूफान उठ गया। उसकी आँखों में एक भयानक चमक थी, मानो वह आकाश का स्वामी हो।

बंकर के सैनिकों ने तुरंत अपने हथियार उठाए।

“गोली चलाओ!” एक अधिकारी चिल्लाया।

तेज आवाज़ों के साथ ऊर्जा तोपों से किरणें निकलकर आकाश की ओर गईं। लेकिन राज गिद्ध मानो बिजली की तरह आकाश में घूम गया और सारी किरणें खाली हवा में चली गईं।

अगले ही क्षण वह नीचे झपटा।

उसकी विशाल चोंच ने बंकर के लोहे के द्वार को ऐसे फाड़ दिया जैसे वह कोई पतली लकड़ी हो।

सैनिकों में भगदड़ मच गई।

कई सैनिकों ने अपनी जान बचाने की कोशिश की, पर राज गिद्ध की गति बहुत तेज थी। उसने कुछ ही क्षणों में बंकर के चारों ओर की सुरक्षा व्यवस्था को नष्ट कर दिया।

कैमरे का दृश्य अचानक काँपने लगा।

फिर सब कुछ अंधकार में बदल गया।

स्क्रीन बंद हो गया।


नियंत्रण कक्ष में सन्नाटा

पूरा नियंत्रण कक्ष स्तब्ध रह गया।

कुछ क्षणों तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर एक वैज्ञानिक ने धीमी आवाज़ में कहा—

“यदि राज गिद्ध इस प्रकार हमारे बंकरों को खोजने लगा… तो हमारे सारे गुप्त मार्ग खतरे में पड़ जाएंगे।”

शिवा ने अपनी मुट्ठी कस ली।

“निशाचर ने हमारे ही हथियार को हमारे विरुद्ध कर दिया है।”

तभी उनके पास खड़ा आर्य आगे बढ़ा।

उसकी आँखों में भय नहीं था। बल्कि उनमें जिज्ञासा और संकल्प दोनों थे।

“क्या वह वही प्राणी है जिसे आपने बनाया था?”

शिवा ने सिर हिलाया।

“हाँ… वह कभी मानवता की रक्षा के लिए बनाया गया था।”

आर्य ने स्क्रीन की ओर देखा जहाँ कुछ देर पहले वह भयानक दृश्य दिखाई दे रहा था।

फिर उसने शांत स्वर में कहा—

“तो उसे रोकना भी हमारा ही कर्तव्य है।”


सतह पर जाने की तैयारी

शिवा ने तुरंत अपने सेनापतियों को बुलाया।

“सतह अभियान की तैयारी करो।”

एक सेनापति ने आश्चर्य से पूछा—

“महाराज, क्या आप स्वयं सतह पर जाने का विचार कर रहे हैं?”

शिवा ने उत्तर दिया—

“नहीं।”

फिर उन्होंने आर्य की ओर देखा।

“यह जाएगा।”

कमरे में खड़े सभी लोग एक साथ आर्य की ओर देखने लगे।

वह अभी-अभी जागा था। उसने अभी तक पृथ्वी की सतह भी नहीं देखी थी।

आचार्य वेदांत ने चिंता से कहा—

“महाराज, यह जोखिम भरा है। उसका शरीर शक्तिशाली है, पर हमें उसके अनुभव के बारे में कुछ नहीं पता।”

शिवा ने शांत स्वर में उत्तर दिया—

“यदि हमें भविष्य चाहिए… तो हमें जोखिम उठाना ही होगा।”

फिर उन्होंने आर्य से पूछा—

“क्या तुम तैयार हो?”

आर्य ने बिना एक क्षण सोचे उत्तर दिया—

“हाँ।”


पृथ्वी की सतह

कुछ ही समय बाद एक गुप्त सुरंग का द्वार खोला गया।

यह सुरंग सीधे पृथ्वी की सतह तक जाती थी।

आर्य पहली बार उस मार्ग से ऊपर जाने वाला था।

जब वह सुरंग के अंतिम द्वार तक पहुँचा, तो सामने का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

और पहली बार उसने पृथ्वी की सतह को देखा।

आकाश धूसर था।

धरती काली राख से ढकी हुई थी।

दूर-दूर तक टूटे हुए शहरों के खंडहर फैले हुए थे।

वातावरण में एक अजीब सी गंध थी — विकिरण और मृत्यु की गंध।

पर आश्चर्य की बात यह थी कि आर्य को उस वातावरण से कोई कष्ट नहीं हुआ।

उसका शरीर उसी संसार के लिए बनाया गया था।

उसने गहरी साँस ली।

और धीरे-धीरे बाहर कदम रखा।


आकाश का सामना

अचानक आकाश में एक भयानक आवाज़ गूँजी।

पंखों की विशाल ध्वनि।

आर्य ने ऊपर देखा।

आकाश में एक विशाल छाया घूम रही थी।

वह था — राज गिद्ध

उसकी तीक्ष्ण आँखें नीचे की धरती को खोज रही थीं।

कुछ ही क्षणों में उसकी दृष्टि आर्य पर पड़ गई।

दोनों की आँखें मिलीं।

एक था मानवता की नई आशा।

और दूसरा था मानवता का सबसे बड़ा खतरा।

राज गिद्ध ने एक तीखी चीख मारी और बिजली की गति से नीचे झपटा।

धरती काँप उठी।

आर्य स्थिर खड़ा रहा।

जैसे वह उसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहा हो।

जब राज गिद्ध उसके ऊपर पहुँचा, तो उसने अपनी विशाल चोंच से आर्य को पकड़ने का प्रयास किया।

पर उसी क्षण आर्य ने असंभव गति से छलांग लगाई।

उसने राज गिद्ध के पंख को पकड़ लिया।

एक भयंकर संघर्ष शुरू हो गया।

धरती पर धूल का तूफान उठ गया।

आकाश में उड़ता हुआ वह विशाल पक्षी और उसके पंखों से लटकता हुआ नव मानव — यह दृश्य मानो किसी प्राचीन युद्ध की तरह था।

और उसी क्षण मानवता का भविष्य उस संघर्ष में झूलने लगा।


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