प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष
शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर
अध्याय – 2. नव मानव का जागरण
भूमिगत नगर “जीवन रक्षा” के भीतर उस दिन एक असाधारण हलचल थी। सामान्य दिनों में जहाँ वैज्ञानिक अपने-अपने प्रयोगों में शांतिपूर्वक लगे रहते थे, वहीं आज प्रयोगशालाओं के गलियारों में सैनिकों और वैज्ञानिकों की आवाजाही तेज़ हो गई थी। ऐसा लग रहा था मानो कोई बहुत बड़ा निर्णय लिया जाने वाला हो।
उस विशाल प्रयोगशाला के केंद्र में एक गोलाकार कक्ष था। उस कक्ष के चारों ओर पारदर्शी दीवारें थीं जिनके पीछे अनेक यंत्र निरंतर चमकते हुए संकेत दे रहे थे। उसी कक्ष के मध्य में एक लंबा पारदर्शी पात्र रखा हुआ था जिसमें एक अद्भुत मानव आकृति शांति से सोई हुई थी।
वह था नव मानव।
उसका शरीर किसी साधारण मनुष्य की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ और संतुलित था। उसकी त्वचा पर हल्की धात्विक चमक दिखाई देती थी, मानो उसका शरीर विकिरण और विषैले वातावरण का सामना करने के लिए विशेष रूप से बनाया गया हो।
प्रयोगशाला के बाहर खड़े वैज्ञानिकों के चेहरे पर उत्सुकता और भय दोनों झलक रहे थे।
उसी समय कक्ष का द्वार खुला और शिवा भीतर प्रवेश किया।
शिवा की चाल में दृढ़ता थी, पर उसके चेहरे पर चिंता की रेखाएँ भी स्पष्ट थीं। उसने चारों ओर देखा और धीरे से कहा—
“क्या सब तैयार है?”
मुख्य वैज्ञानिक आचार्य वेदांत आगे बढ़े और बोले—
“हाँ महाराज। वर्षों के अनुसंधान के बाद आज वह क्षण आ गया है। यदि सब कुछ ठीक रहा तो यह प्रयोग मानव इतिहास की दिशा बदल देगा।”
शिवा कुछ क्षण उस पारदर्शी पात्र को देखते रहे। उस पात्र के भीतर सोया हुआ प्राणी किसी शांत पर्वत की तरह स्थिर था।
शिवा ने धीमे स्वर में कहा—
“क्या वह जागने के लिए तैयार है?”
आचार्य वेदांत ने उत्तर दिया—
“उसके शरीर में मानव डीएनए, विकिरण प्रतिरोधी जीन और कृत्रिम रूप से विकसित कोशिकाएँ सम्मिलित हैं। वह पृथ्वी की सतह पर बिना किसी सुरक्षा के जीवित रह सकता है।”
फिर वे थोड़ी देर रुके और बोले—
“परंतु एक समस्या है।”
शिवा ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“कौन सी समस्या?”
“हम नहीं जानते कि जागने के बाद उसका मन कैसा होगा। वह मनुष्य की तरह सोच पाएगा या नहीं — यह अभी तक निश्चित नहीं है।”
प्रयोगशाला में उपस्थित सभी लोग मौन हो गए।
शिवा ने गहरी साँस ली और कहा—
“यदि मानवता को बचाना है तो हमें यह जोखिम उठाना ही होगा।”
उन्होंने अपना हाथ उठाकर संकेत दिया।
“उसे जगाइए।”
जागरण की प्रक्रिया
वैज्ञानिकों ने तुरंत अपने-अपने उपकरण सक्रिय कर दिए।
यंत्रों से धीमी-धीमी ध्वनियाँ निकलने लगीं।
पारदर्शी पात्र के भीतर का द्रव धीरे-धीरे कम होने लगा। अनेक सूक्ष्म नलिकाएँ उस प्राणी के शरीर से अलग की जाने लगीं।
प्रयोगशाला की दीवारों पर लगे संकेतक तेज़ी से चमकने लगे।
“हृदय गति स्थिर है…”
“तंत्रिका तंत्र सक्रिय हो रहा है…”
“मस्तिष्क संकेत बढ़ रहे हैं…”
आचार्य वेदांत ने कहा—
“जागरण प्रारंभ हो चुका है।”
कुछ क्षणों तक सबकी साँसें थमी रहीं।
अचानक उस प्राणी की उँगलियाँ हल्की सी हिलने लगीं।
एक वैज्ञानिक उत्साह से चिल्लाया—
“उसने प्रतिक्रिया दी!”
धीरे-धीरे उसकी छाती ऊपर-नीचे होने लगी। उसका शरीर मानो लंबे समय की नींद से बाहर आने का प्रयास कर रहा था।
फिर अचानक उसकी आँखें खुल गईं।
वे आँखें सामान्य मनुष्य की आँखों से अलग थीं। उनमें एक गहरी चमक थी — जैसे किसी प्राचीन शक्ति का प्रकाश।
उसने धीरे-धीरे चारों ओर देखा।
पहली बार उसने संसार को देखा था।
प्रयोगशाला के भीतर सन्नाटा छा गया।
फिर वह धीरे से उठकर बैठ गया।
उसके उठते ही पारदर्शी पात्र का ढक्कन खुल गया और वह बाहर आ गया।
उसकी ऊँचाई लगभग सात फुट के आसपास थी। उसका शरीर अत्यंत संतुलित और शक्तिशाली था।
उसने अपनी पहली साँस ली।
उस क्षण ऐसा लगा जैसे प्रयोगशाला की हवा भी बदल गई हो।
पहला प्रश्न
नव मानव ने सामने खड़े लोगों की ओर देखा।
उसकी दृष्टि शिवा पर जाकर स्थिर हो गई।
कुछ क्षण तक वह उन्हें देखता रहा, जैसे उनके भीतर कुछ पढ़ने का प्रयास कर रहा हो।
फिर उसने पहली बार बोलने का प्रयास किया।
उसकी आवाज़ गहरी थी, पर शांत।
“मैं… कौन हूँ?”
प्रयोगशाला में खड़े सभी लोग स्तब्ध रह गए।
शिवा धीरे-धीरे उसके पास गए।
उन्होंने कहा—
“तुम मानवता की नई आशा हो।”
नव मानव ने फिर पूछा—
“मेरा नाम?”
शिवा ने कुछ क्षण सोचा।
फिर बोले—
“तुम्हारा नाम होगा — आर्य।”
नव मानव ने धीरे से वह नाम दोहराया—
“आर्य…”
फिर उसने अपनी मुट्ठियाँ कस लीं। ऐसा लगा जैसे उसके भीतर अद्भुत शक्ति प्रवाहित हो रही हो।
भविष्य का योद्धा
शिवा ने उसे प्रयोगशाला की दीवार पर लगे विशाल नक्शे की ओर ले जाकर दिखाया।
वह नक्शा पृथ्वी का था — परंतु वह पहले जैसी नहीं थी।
वहाँ जले हुए महाद्वीप थे, टूटे हुए शहर थे और विकिरण से प्रभावित क्षेत्र थे।
शिवा ने कहा—
“यह हमारी पृथ्वी है। इसे हमने खो दिया है।”
फिर उन्होंने आगे कहा—
“और तुम्हें इसे वापस जीतना होगा।”
आर्य ने कुछ क्षण उस नक्शे को देखा।
फिर उसकी आँखों में एक नई चमक उभर आई।
उसी समय प्रयोगशाला की छत पर लगा चेतावनी संकेत अचानक चमक उठा।
एक सैनिक घबराते हुए भीतर आया।
“महाराज!”
शिवा ने पूछा—
“क्या हुआ?”
सैनिक ने काँपते हुए कहा—
“राज गिद्ध… उसने हमारे एक बाहरी बंकर को खोज लिया है।”
कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया।
शिवा ने आर्य की ओर देखा।
और धीमे स्वर में कहा—
“लगता है तुम्हारी परीक्षा जल्दी ही शुरू होने वाली है।”
आर्य ने बिना किसी भय के उत्तर दिया—
“तो चलिए… युद्ध शुरू करते हैं।”
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