🌸 नल और दमयंती की कथा (हिंदी अनुवाद) 🌸
निषध देश में वीरसेन के पुत्र एक राजा थे, जिनका नाम नल था। वे अत्यंत बलशाली, रूपवान, अश्वविद्या में निपुण और सभी गुणों से सम्पन्न थे। वे राजाओं में श्रेष्ठ थे, जैसे देवताओं में इन्द्र। उनका तेज सूर्य के समान था। वे ब्राह्मणों के हित में तत्पर रहते, वेदों के ज्ञाता, सत्यवादी और महान वीर थे।
नल दमयंती सम्पूर्ण कथा
Nal Damayanti Full Story Hindi
नलोपाख्यान महाभारत
Damayanti Story Hindi
Kali leaves Nala story
नल दमयंती प्रेम कथा
Hindu Mythology Love Story
Ancient Indian Stories
नल को द्यूत (जुए) का भी शौक था, पर वे एक विशाल सेना के स्वामी, सभी के प्रिय, उच्च आत्मा वाले और इन्द्रियों को वश में रखने वाले थे। वे सबके रक्षक, श्रेष्ठ धनुर्धर और स्वयं मनु के समान माने जाते थे।
इसी प्रकार विदर्भ देश में भीम नाम के एक पराक्रमी राजा थे। वे अत्यंत वीर, धर्मात्मा और अपनी प्रजा के हितकारी थे, परंतु वे संतानहीन थे। संतान की प्राप्ति के लिए वे निरंतर प्रयास करते रहे।
नल और दमयंती का प्रेम
स्वयंवर की कथा
कली का प्रवेश और द्यूत क्रीड़ा
वनवास और वियोग
कर्कोटक और नल का परिवर्तन
दमयंती की खोज
कली का अंत
पुनर्मिलन
राज्य की पुनः प्राप्ति
एक बार उनके पास दमन नाम के एक ब्रह्मर्षि आए। राजा भीम और उनकी रानी ने अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ उनकी सेवा की। प्रसन्न होकर उस महर्षि ने उन्हें वरदान दिया—एक अत्यंत सुन्दर और गुणों से युक्त पुत्री तथा तीन तेजस्वी और यशस्वी पुत्र।
उनके चार संतानों के नाम थे—दमयंती, दम, दन्त और दमन। तीनों पुत्र अत्यंत पराक्रमी और गुणवान थे।
उनकी पुत्री दमयंती, अपनी अद्वितीय सुंदरता, तेज, सौभाग्य और मधुर स्वभाव के कारण पूरे संसार में प्रसिद्ध हो गई। जब वह युवावस्था को प्राप्त हुई, तब सैकड़ों सुसज्जित दासियाँ उसकी सेवा में रहती थीं, जैसे इन्द्राणी शची की सेवा होती है।
राजा भीम की यह सुन्दरी पुत्री, सभी आभूषणों से सुसज्जित होकर अपनी सखियों के बीच ऐसे शोभित होती थी, जैसे बादलों के बीच चमकती हुई बिजली।
उस विशाल नेत्रों वाली कन्या की सुंदरता लक्ष्मी के समान थी। न देवताओं में, न यक्षों में और न ही मनुष्यों में—ऐसी सुंदरता किसी ने पहले कभी देखी या सुनी थी।
उसकी अद्भुत रूप-छटा को देखकर देवताओं के हृदय भी आनंद से भर उठते थे। ✨
🌸 नल और दमयंती का प्रेम (हिंदी अनुवाद) 🌸
नल और दमयंती एक-दूसरे को बिना देखे ही प्रेम करने लगे।
नल पुरुषों में सिंह के समान थे—तीनों लोकों में उनका कोई समान नहीं था। रूप में वे स्वयं कामदेव (कन्दर्प) के समान थे।
दूत (गायक/प्रशंसक) बार-बार दमयंती के सामने नल के गुणों का वर्णन करते और नल के सामने दमयंती के सौंदर्य व गुणों का गुणगान करते। इस प्रकार एक-दूसरे के गुणों को सुनते-सुनते दोनों के हृदय में ऐसा प्रेम उत्पन्न हुआ जो दर्शन के बिना ही जन्मा था—और वह प्रेम दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। ❤️
🌿 नल की व्याकुलता
अब नल अपने हृदय में उठे प्रेम को रोक नहीं पाए। वे अपने महल के बगीचों में अकेले समय बिताने लगे।
एक दिन उन्होंने वहाँ स्वर्ण-पंखों वाले हंसों का एक समूह देखा। उन्होंने उनमें से एक हंस को पकड़ लिया।
तब वह आकाश में विचरण करने वाला हंस मनुष्य की भाषा में बोला—
“राजन! मुझे मत मारिए। मैं आपके लिए एक प्रिय कार्य करूँगा। मैं दमयंती के सामने आपके गुणों का ऐसा वर्णन करूँगा कि वह किसी अन्य को पति रूप में कभी नहीं चाहेगी।”
यह सुनकर नल ने उस हंस को छोड़ दिया।
🕊️ हंस का संदेश
वे हंस उड़कर विदर्भ देश पहुँचे और दमयंती के सामने उतरे।
दमयंती अपनी सखियों के साथ उन्हें देखकर अत्यंत प्रसन्न हुई और उन्हें पकड़ने का प्रयास करने लगी।
हंस इधर-उधर उड़ गए और हर सखी एक-एक हंस के पीछे दौड़ने लगी।
जिस हंस के पीछे दमयंती दौड़ी, उसने उसे एकांत स्थान पर ले जाकर मनुष्य की भाषा में कहा—
“हे दमयंती! निषध देश में नल नाम के एक राजा हैं। वे रूप में अश्विनी कुमारों के समान हैं और उनका कोई समान नहीं। वे स्वयं कामदेव के समान सुंदर हैं। यदि तुम उनकी पत्नी बनो, तो तुम्हारा यह सौंदर्य सार्थक होगा।
हमने देवताओं, गंधर्वों, नागों और मनुष्यों को देखा है, पर नल जैसा कोई नहीं देखा। तुम भी स्त्रियों में रत्न हो और नल पुरुषों में श्रेष्ठ। श्रेष्ठ का श्रेष्ठ से मिलन ही मंगलकारी होता है।”
💌 दमयंती का उत्तर
यह सुनकर दमयंती ने कहा—
“तुम यही बात नल से भी कहना।”
हंस ने “ऐसा ही होगा” कहकर नल के पास जाकर सब कुछ बता दिया।
💔 प्रेम की पीड़ा
हंस की बात सुनने के बाद दमयंती का मन पूरी तरह नल में लग गया।
वह बेचैन रहने लगी, बार-बार आहें भरती, चिंतित और उदास रहने लगी।
उसका चेहरा पीला पड़ गया, शरीर दुर्बल हो गया और वह मानो प्रेमवश पागल सी दिखने लगी।
उसे न दिन में चैन था न रात में—वह हमेशा “हाय!” और “अह!” कहकर रोती रहती थी।
उसने शैय्या, आसन और सभी सुख-साधनों में रुचि खो दी।
👑 स्वयंवर का निर्णय
उसकी यह स्थिति देखकर उसकी दासियों ने इशारों में राजा भीम को सब बताया।
राजा भीम चिंतित हो गए और सोचने लगे—
“मेरी पुत्री को क्या हो गया है?”
जब उन्होंने विचार किया कि दमयंती अब युवावस्था को प्राप्त हो चुकी है, तो उन्होंने उसका स्वयंवर कराने का निश्चय किया।
उन्होंने समस्त राजाओं को आमंत्रित करते हुए घोषणा की—
“हे वीरों! जान लो कि दमयंती का स्वयंवर होने वाला है!”
🌟 यहाँ से प्रेम की कथा और भी रोमांचक मोड़ लेती है…
🌸 दमयंती का स्वयंवर (हिंदी अनुवाद) 🌸
दमयंती के स्वयंवर का समाचार सुनकर पृथ्वी के सभी राजा, भीम के आमंत्रण के अनुसार, विदर्भ देश में आ पहुँचे। उनके रथों की गड़गड़ाहट, हाथियों की गर्जना और घोड़ों की हिनहिनाहट से मानो पूरी पृथ्वी गूँज उठी।
वे सभी राजा अपने-अपने विशाल, सुसज्जित और अलंकारों से सजे हुए सेनाओं के साथ आए थे।
राजा भीम ने उन सभी महान राजाओं का यथोचित सम्मान किया और आदरपूर्वक उनका स्वागत किया। सम्मानित होकर वे सभी वहाँ ठहर गए।
🌿 देवताओं तक पहुँची खबर
इसी समय आकाश मार्ग से विचरण करते हुए देवर्षि नारद और पर्वत ऋषि इन्द्रलोक पहुँचे।
इन्द्र ने उनका आदर-सत्कार किया और उनकी कुशल-क्षेम पूछी।
लेकिन अब वे राजा कहाँ हैं? वे मेरे प्रिय अतिथि क्यों नहीं आ रहे?”
📢 नारद का उत्तर
वह सौंदर्य में समस्त स्त्रियों से श्रेष्ठ है। इसलिए पृथ्वी के सभी राजा और राजकुमार वहाँ जा रहे हैं।
वे सभी उस अद्वितीय सुंदरी को पाने के लिए उत्सुक हैं।”
⚡ देवताओं का निर्णय
यह सुनकर इन्द्र सहित अन्य देवता—जिनमें अग्नि और अन्य लोकपाल भी थे—वहाँ उपस्थित हो गए।
🌸 नल का देवताओं के दूत बनकर दमयंती के पास जाना (हिंदी अनुवाद) 🌸
नल, जो महान आत्मा और वीर राजा थे, जब उन्होंने दमयंती के स्वयंवर की सभा के बारे में सुना, तो वे भी हर्षित मन और प्रेम से भरे हृदय के साथ वहाँ के लिए निकल पड़े।
मार्ग में देवताओं ने उन्हें देखा। उनका रूप इतना अद्भुत था कि वे स्वयं कामदेव के समान प्रतीत होते थे। उनकी तेजस्विता सूर्य के समान चमक रही थी।
🌿 देवताओं का आदेश
⚖️ नल की दुविधा
🌺 नल और दमयंती का प्रथम मिलन
नल का प्रेम और भी बढ़ गया, परंतु सत्य के पालन हेतु उन्होंने अपने भावों को दबा लिया।
💬 संवाद
❤️ दमयंती का प्रेम
यह सुनकर दमयंती ने देवताओं को प्रणाम किया और नल से कहा—
⚠️ नल का धर्म-संकट
💎 दमयंती का निर्णय
🔚 नल का लौटना
नल वापस देवताओं के पास गए और सब कुछ बताया—
🌸 दमयंती द्वारा नल का वरण और उसके बाद की घटनाएँ (हिंदी अनुवाद) 🌸
💍 स्वयंवर का महान क्षण
शुभ मुहूर्त में राजा भीम ने स्वयंवर का आयोजन किया। पृथ्वी के सभी राजा वहाँ उपस्थित हुए—स्वर्ण स्तंभों से सजे विशाल सभागार में।
जब दमयंती सभा में आई, तो उसकी सुंदरता ने सबका मन मोह लिया। ✨
🙏 सत्य की पुकार
दमयंती ने मन ही मन देवताओं से प्रार्थना की—
देवताओं ने उसकी सच्ची भक्ति और प्रेम देखकर अपने वास्तविक लक्षण प्रकट किए—
- देवताओं के शरीर पर पसीना नहीं था
- उनकी आँखें पलक नहीं झपकती थीं
- उनके पुष्पहार मुरझाते नहीं थे
- वे भूमि को स्पर्श नहीं कर रहे थे
❤️ प्रेम की विजय
दमयंती ने नल को पहचान लिया और सबके सामने उन्हें वरमाला पहनाई।
🎁 देवताओं के वरदान
प्रसन्न होकर देवताओं ने नल को अनेक वरदान दिए—
- इन्द्र → यज्ञों में दर्शन और स्वर्ग प्राप्ति
- अग्नि → इच्छा से प्रकट होने की शक्ति
- यम → श्रेष्ठ धर्म और स्वाद की अनुभूति
- वरुण → दिव्य सुगंध और उपस्थिति
इसके बाद नल-दमयंती का विवाह हुआ और वे सुखपूर्वक जीवन बिताने लगे। 🌿
⚡ कलि का क्रोध
जब देवता लौट रहे थे, तब कलियुग (कली) और द्वापर उनसे मिले।
🎲 नल का पतन
नल जुए में फँस गए और—
- धन
- राज्य
- रथ
- वस्त्र
सब हार गए।
😢 दमयंती का दुःख
दमयंती अत्यंत दुखी हुई। उसने अपने बच्चों को सुरक्षित स्थान भेज दिया।
यह सुनकर नल का हृदय क्रोध और पीड़ा से भर गया…
🌿 नल और दमयंती का वनवास (हिंदी अनुवाद) 🌿
🏹 राज्य से वन तक
इस भय से कोई भी नागरिक उनकी सहायता करने का साहस न कर सका।
🌾 भूख और कष्ट
🎲 भाग्य का उपहास
अब नल पूर्णतः निराश और निर्वस्त्र हो गए।
💔 नल का दुःख और निर्णय
नल ने दुखी होकर दमयंती से कहा—
नल बार-बार रास्ते बताते रहे—मानो उन्हें विदर्भ भेजना चाहते हों।
😢 दमयंती का प्रेम
दमयंती ने आँसू भरी आँखों से कहा—
🤍 नल का उत्तर
नल बोले—
⚖️ अंतर्द्वंद्व
दमयंती ने कहा—
🔥 नल का स्वाभिमान
नल ने उत्तर दिया—
🌙 नल का दमयंती को त्यागना (हिंदी अनुवाद) 🌙
🌌 वन की रात और थका हुआ प्रेम
राजा नल और दमयंती, दोनों एक ही वस्त्र में, भूख-प्यास से व्याकुल, भटकते-भटकते एक यात्री-शाला (छोटे आश्रय) में पहुँचे।
⚖️ नल का अंतर्द्वंद्व
नल के मन में तूफ़ान उठ रहा था—
- राज्य का नाश
- मित्रों का साथ छूटना
- वन का कष्ट
फिर मन में विचार आया—
💔 कठोर निर्णय
उनका मन कली (दुर्भाग्य) के प्रभाव में आ चुका था।
✂️ वस्त्र का विभाजन
😢 प्रेम की अंतिम पुकार
दमयंती को देखकर रो पड़े—
वह अकेली कैसे इस भयानक जंगल में जीवित रहेगी?”
उन्होंने देवताओं से प्रार्थना की—
🔄 प्रेम और भाग्य का संघर्ष
नल बार-बार जाते और लौटते रहे—
उनका हृदय मानो दो टुकड़ों में बँट गया था…
🌑 अंतिम वियोग
👉 नल दमयंती को सोते हुए ही वन में अकेला छोड़कर चले गए।
🌧️ दमयंती का विलाप और उसकी पीड़ा (हिंदी अनुवाद) 🌧️
🌄 जागरण और अकेलापन
जब नल उसे छोड़कर चले गए, तब कुछ समय बाद दमयंती नींद से जागी।
वह भय और दुःख से चिल्ला उठी—
💔 करुण पुकार
दमयंती रोते हुए बोली—
😢 अपने दुःख से अधिक नल की चिंता
दमयंती का प्रेम इतना गहरा था कि उसने कहा—
🌲 पागलों-सी खोज
वह वन में इधर-उधर दौड़ने लगी—
- कभी गिरती
- कभी उठती
- कभी रोती
- कभी डर जाती
👉 जैसे कोई पागल हो गया हो…
⚡ श्राप और वेदना
दुःख से भरी दमयंती बोली—
🐍 सर्प का आक्रमण
🏹 शिकारी का आगमन
दमयंती ने अपनी पूरी कथा सुना दी।
🔥 वासना और क्रोध
⚡ श्राप की शक्ति
दमयंती ने कहा—
💀 अंत
यहाँ आपका पूर्ण, बिना संक्षिप्त किया हुआ, सीधा-साधा हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है —
🌿 दमयंती का विलाप (नल की खोज में आगे)
उस शिकारी को नष्ट करने के बाद, दमयंती उस भयानक और निर्जन वन में आगे बढ़ी, जो झींगुरों की आवाज़ से गूंज रहा था। वह वन सिंहों, चीते, रुरु मृग, बाघ, भैंस, भालू और हिरणों से भरा हुआ था। वहाँ अनेक प्रकार के पक्षी थे, और चोरों तथा म्लेच्छ जातियों का भी वास था।
उस वन में साल, बाँस, धावा, अश्वत्थ, तिंदुक, इंगुद, किंशुक, अर्जुन, नीम, तिनिश, साल्मलि, जामुन, आम, लोध्र, खैर, बेंत, पद्मक, आंवला, प्लक्ष, कदंब, उदुम्बर, बेर, बेल, बरगद, पियाल, ताड़, खजूर, हरितकी और विभीतक आदि वृक्ष थे।
विदर्भ की राजकुमारी ने वहाँ अनेक पर्वत देखे, जिनमें विभिन्न प्रकार की धातुएँ थीं; अनेक उपवन देखे, जो पक्षियों के मधुर गीतों से गूंज रहे थे; अद्भुत घाटियाँ, नदियाँ, सरोवर, तालाब, और अनेक प्रकार के पशु-पक्षी देखे।
उसने असंख्य सर्प, भूत-प्रेत, भयानक राक्षस, जलाशय, टीले, झरने और सुंदर जलस्रोत देखे। उसने भैंसों, सूअरों, भालुओं और वन के सर्पों के झुंड भी देखे।
अपने धर्म, तेज, सौभाग्य और धैर्य के बल पर सुरक्षित दमयंती उस वन में अकेली नल की खोज करती हुई भटकती रही।
वह केवल अपने पति के वियोग से दुखी थी, उस भयानक वन से उसे कोई भय नहीं था।
एक पत्थर पर बैठकर, अपने पति के दुःख से काँपते हुए अंगों के साथ, वह इस प्रकार विलाप करने लगी—
💔 दमयंती का करुण पुकार
मैं इस भयानक वन में नष्ट होने जा रही हूँ—आप मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?
यह भयंकर वनराज, विकराल मुख वाला और भूख से व्याकुल, मुझे भयभीत कर रहा है—क्या आपको मुझे बचाना नहीं चाहिए?
आप तो कहते थे—‘तुम्हारे अतिरिक्त मुझे कोई प्रिय नहीं’—अब अपने उस वचन को सिद्ध कीजिए।
मैं आपकी प्रिय पत्नी हूँ, विलाप कर रही हूँ, मूर्छित-सी हूँ—फिर भी आप मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?
मुझे देखिए—मैं क्षीण, दुःखी, पीली, आधे वस्त्र में, अकेली, रोती हुई—एक अकेली हिरणी की तरह भटक रही हूँ।
मैं ही दमयंती हूँ—आपकी पत्नी—इस विशाल वन में आपको पुकार रही हूँ।
मैं इस पर्वत पर भी आपको नहीं देखती—इस भयानक वन में, जहाँ सिंह और बाघ हैं—आप लेटे हैं, बैठे हैं, खड़े हैं या कहीं चले गए—मैं किससे पूछूँ?
मैं किससे पूछूँ—‘क्या तुमने इस वन में उस वीर, सुंदर, महात्मा नल को देखा है?’
देखो, यह वन का राजा—सुंदर चाल वाला बाघ आ रहा है—मैं उससे भी निर्भय होकर पूछूँगी—
🏔️ पर्वत से प्रार्थना
मेरे पिता विदर्भराज भीम हैं—जो धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करते हैं, जिन्होंने राजसूय और अश्वमेध यज्ञ किए हैं।
मैं उसी धर्मात्मा, यज्ञ करने वाले, ब्राह्मणों के प्रिय, सत्यवादी नल की पत्नी हूँ।
मैं अकेली रो रही हूँ—क्या तुम मुझे अपनी बेटी समझकर सांत्वना नहीं दोगे?
हे नाथ! यदि आप इस वन में हैं—तो प्रकट हो जाइए।
नीचे दिया गया अंश पूर्ण और सीधा हिन्दी अनुवाद है — बिना किसी संक्षेप के:
दमयंती को एक आश्रम दिखाई देता है जो बाद में अदृश्य हो जाता है (पूर्ण हिन्दी अनुवाद)
उस पर्वत से इस प्रकार संवाद करने के बाद दमयंती उत्तर दिशा की ओर चली। तीन दिन और तीन रातों तक चलते हुए वह श्रेष्ठ स्त्री एक अद्भुत तपोवन में पहुँची, जो सौंदर्य में मानो स्वर्ग के उपवन के समान था।
उस मनोहर आश्रम में उसने ऐसे तपस्वियों को देखा जो , और के समान थे—व्रतशील, अल्पाहारी, इन्द्रिय-निग्रह करने वाले, पवित्र और धर्मनिष्ठ। कुछ केवल जल पर, कुछ वायु पर, और कुछ गिरे हुए पत्तों पर जीवन यापन करते थे। वे वृक्षों की छाल और मृगचर्म धारण किए हुए थे और स्वर्ग-प्राप्ति के मार्ग में लगे हुए थे।
ऐसे तपस्वियों से युक्त, हिरणों और वानरों से भरे उस आश्रम को देखकर दमयंती प्रसन्न हुई और वहाँ प्रवेश किया। तप में वृद्ध उन ऋषियों को प्रणाम कर वह विनम्रता से खड़ी हो गई।
विदर्भ देश में भीम नाम के एक महान राजा हैं—मैं उनकी पुत्री हूँ। निषध देश के राजा नल मेरे पति हैं—वे सत्यवादी, वीर और विद्वान हैं। किन्तु कुछ दुष्ट, छल करने वाले लोगों ने उन्हें जुए में फँसा कर उनका राज्य और धन छीन लिया।
मैं वही दमयंती हूँ—उस महान राजा की पत्नी—जो अपने पति की खोज में दुखी होकर वन, पर्वत, नदी, सरोवर आदि में भटक रही हूँ।
क्या नल यहाँ इस आश्रम में आए हैं? मैं उसी की खोज में इस भयानक वन में आई हूँ। यदि कुछ ही दिनों में मुझे नल नहीं मिले, तो मैं इस शरीर का त्याग कर दूँगी। उनके बिना मेरा जीवन व्यर्थ है।”
यह कहकर वे तपस्वी, उनका आश्रम और यज्ञाग्नि—सब अचानक अदृश्य हो गए।
कुछ समय तक ऐसा सोचने के बाद, पति के वियोग से दुखी होकर उसका मुख पुनः पीला पड़ गया।
हे अशोक! अपने नाम को सार्थक करो—क्योंकि ‘अशोक’ का अर्थ है शोक को दूर करने वाला।”
वह उस वृक्ष की तीन बार परिक्रमा करके आगे बढ़ी और वन के और भी भयानक भाग में प्रवेश कर गई।
भटकते हुए उसने अनेक वृक्ष, नदियाँ, पर्वत, पशु-पक्षी, गुफाएँ और अद्भुत नदियों को देखा।
व्यापारियों के काफिले से मिलना (पूर्ण हिन्दी अनुवाद)
आगे चलते हुए वह एक चौड़े मार्ग पर पहुँची जहाँ उसने एक विशाल व्यापारियों का काफिला देखा—घोड़ों और हाथियों सहित—जो एक सुंदर नदी के किनारे रुका हुआ था। वह नदी स्वच्छ, शीतल, सरकंडों से घिरी, पक्षियों की ध्वनियों से गूँजती और मछलियों तथा कछुओं से भरी हुई थी।
दमयंती उस काफिले के बीच पहुँची—वह आधे वस्त्र में, धूल से ढकी, दुर्बल और शोकग्रस्त थी। उसे देखकर कुछ लोग डरकर भागे, कुछ हँसे, कुछ घृणा करने लगे और कुछ ने दया दिखाई।
यह सुनकर दमयंती भी उसी काफिले के साथ चल पड़ी, अपने पति की खोज में।
कई दिनों बाद वे एक विशाल, कमलों से सुगंधित सरोवर के पास पहुँचे—जो अत्यंत सुंदर और मन को मोह लेने वाला था। वहाँ घास, फल, फूल और शीतल जल की प्रचुरता थी।
थके हुए व्यापारी वहीं रुक गए और संध्या होने पर उसी स्थान पर विश्राम करने लगे।
नीचे दिया गया अंश पूर्ण, सीधा और बिना किसी संक्षेप के हिन्दी अनुवाद है:
हाथियों का आक्रमण और काफिले का विनाश (पूर्ण हिन्दी अनुवाद)
आधी रात के समय, जब चारों ओर पूर्ण शांति छाई हुई थी और थका हुआ काफिला गहरी नींद में सो चुका था, उसी समय एक हाथियों का झुंड एक पर्वतीय जलधारा की ओर पानी पीने जा रहा था। उनके मस्तक से बहता मद-रस उस जल को गंदा कर रहा था।
वे हाथी उस काफिले को और उसमें मौजूद पालतू हाथियों को देखकर उग्र हो उठे। अपने पालतू साथियों को देखकर वे जंगली हाथी क्रोधित हो गए और उन्हें मारने के उद्देश्य से अत्यंत वेग से उनकी ओर दौड़ पड़े।
उनका आक्रमण इतना भयंकर था कि मानो पर्वत की चोटियों से टूटकर गिरते हुए शिखर मैदान की ओर लुढ़कते चले आ रहे हों।
काफिला उस समय कमल-सरोवर के चारों ओर सो रहा था और उसने वन के रास्तों को अवरुद्ध कर रखा था। अचानक हाथियों ने भूमि पर सोए हुए लोगों को कुचलना आरम्भ कर दिया।
व्यापारी “हाय!” और “अरे!” चिल्लाते हुए, नींद से घबराकर उठे और प्राण बचाने के लिए जंगल की ओर भागने लगे।
- कुछ हाथियों के दाँतों से मारे गए
- कुछ उनकी सूँड से
- और कुछ उनके पैरों से कुचल दिए गए
असंख्य ऊँट और घोड़े मारे गए। भयभीत होकर भागते हुए अनेक मनुष्य एक-दूसरे को ही कुचलने लगे।
इस प्रकार उस विशाल हाथी-झुंड के अचानक आक्रमण से वह सुंदर काफिला भारी विनाश का शिकार हो गया।
ऐसी चिल्लाहटों के बीच लोग इधर-उधर भागने लगे।
दमयंती का भय और व्यापारियों का संदेह
दमयंती का आत्मविलाप
व्यापारियों के ये भयानक शब्द सुनकर दमयंती भय, लज्जा और चिंता से काँप उठी और किसी अनिष्ट की आशंका से जंगल में भाग गई।
- मेरे पति का राज्य छिन गया,
- वे अपने ही बंधुओं से हार गए,
- मैं अपने पति और अपने पुत्र-पुत्री से अलग हो गई,
- मैं असहाय होकर इस भयंकर वन में भटक रही हूँ।”
अगले दिन का शोक
अगले दिन काफिले के बचे हुए लोग अपने मारे गए भाई, पिता, पुत्र और मित्रों का विलाप करते हुए वहाँ से चले गए।
निश्चित ही मुझे लंबे समय तक दुःख सहना होगा।
मुझे लगता है कि यह मेरे उस अपराध का फल है कि मैंने स्वयंवर में आए देवताओं (लोकपालों) को छोड़कर नल को चुना था।”
नीचे दिया गया अंश पूर्ण, सीधा और बिना किसी संक्षेप के हिन्दी अनुवाद है:
दमयंती का चेदि देश में पहुँचना (पूर्ण हिन्दी अनुवाद)
इस प्रकार विलाप करती हुई, शोक से पीड़ित और शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान पीली पड़ चुकी दमयंती उन ब्राह्मणों के साथ आगे बढ़ी, जो काफिले के विनाश से बच गए थे।
तेजी से चलते हुए, संध्या के समय वह चेदि देश के राजा सुबाहु की विशाल नगरी में पहुँची। आधे वस्त्र में वह उस सुंदर नगर में प्रवेश कर गई।
उसे देखकर नगर के बालक जिज्ञासा से उसके पीछे-पीछे चलने लगे। भीड़ से घिरी हुई वह राजा के महल के सामने पहुँच गई।
दासी ने जाकर भीड़ को हटाया और दमयंती को रानी-माता के सामने ले आई।
मेरे पति अनंत गुणों से युक्त थे और मुझसे अत्यंत प्रेम करते थे। मैं भी उनकी छाया की भाँति उनके साथ रहती थी।
एक समय वे जुए में फँस गए। हारकर वे वन में चले आए। मैं भी उनके साथ वन में गई और उन्हें सांत्वना देती रही।
एक दिन भूख और प्यास से पीड़ित होकर उन्होंने अपना एकमात्र वस्त्र भी खो दिया। मैं भी एक ही वस्त्र में उनके पीछे-पीछे चलती रही। कई दिनों तक मैंने नींद नहीं ली।
अंततः जब मैं सो रही थी, उन्होंने मेरे वस्त्र का आधा भाग काट लिया और मुझे बिना किसी दोष के छोड़कर चले गए।
मैं अपने उस प्रिय पति की खोज में भटक रही हूँ—जो कमल के तंतु के समान कोमल वर्ण वाले हैं। उनके बिना मैं दिन-रात शोक में जल रही हूँ।”
रानी-माता का सहारा
- मैं किसी का जूठा भोजन नहीं खाऊँगी
- मैं किसी के पैर नहीं धोऊँगी
- मैं किसी अन्य पुरुष से बात नहीं करूँगी
- यदि कोई मुझे पत्नी बनाने का प्रयास करेगा तो उसे दंड दिया जाए
- यदि वह बार-बार ऐसा करेगा तो उसे मृत्युदंड दिया जाए
मैं यह भी चाहती हूँ कि जो ब्राह्मण मेरे पति की खोज में जाएँ, उनसे मैं मिल सकूँ। यदि आप यह सब स्वीकार करें, तभी मैं यहाँ रहूँगी।”
सुनन्दा ने प्रसन्न होकर दमयंती को अपने महल में ले गई। सम्मानपूर्वक रहने के कारण दमयंती वहाँ संतुष्ट रहने लगी।
नल को कर्कोटक नाग का दंश (पूर्ण हिन्दी अनुवाद)
दमयंती को छोड़कर राजा नल वन में आगे बढ़े। उन्होंने एक भयंकर अग्नि देखी जो घने जंगल में फैल रही थी।
“डरो मत” कहते हुए नल उस अग्नि में प्रवेश कर गए और वहाँ उन्होंने एक महान नाग को देखा जो कुंडली मारे पड़ा था।
कृपया मुझे बचाइए। मैं आपका मित्र बनूँगा। मुझे उठाकर यहाँ से ले चलिए।”
इतना कहकर वह नाग अंगूठे के बराबर छोटा हो गया। नल उसे उठाकर अग्नि से बाहर ले गए।
जैसे ही नल ने दस कदम पूरे किए, नाग ने उन्हें डँस लिया।
उस दंश से नल का रूप तुरंत बदल गया। यह देखकर नल चकित रह गए।
तुम्हें अब किसी शत्रु, पशु या विष का भय नहीं रहेगा। तुम युद्ध में विजयी रहोगे।
अब तुम अयोध्या जाओ और राजा के पास ‘बहुक’ नामक सारथी बनकर रहो। वह तुम्हें जुए की विद्या सिखाएगा और तुम उसे घोड़ों की विद्या सिखाओगे।
समय आने पर तुम अपने राज्य, पत्नी और बच्चों को पुनः प्राप्त करोगे।”
यह कहकर नाग ने नल को दो दिव्य वस्त्र दिए और अदृश्य हो गया।
नल का अयोध्या पहुँचना और बहुक के रूप में जीवन (पूर्ण हिन्दी अनुवाद)
उस नाग द्वारा मुक्त किए जाने के बाद, नल आगे बढ़े और दसवें दिन वे राजा की नगरी में प्रवेश कर गए।
मैं तुम्हें अपने अस्तबल का प्रधान नियुक्त करता हूँ। तुम्हें दस हजार मुद्राओं का वेतन मिलेगा। और सदैव तुम्हारे अधीन रहेंगे। तुम उनके साथ सुखपूर्वक रहोगे। इसलिए हे बहुक! तुम मेरे साथ ही निवास करो।”
राजा के इस प्रकार कहने पर नल ने वहाँ निवास करना आरम्भ कर दिया। वे आदरपूर्वक रखे गए और वर्ष्णेय तथा जीवल उनके साथी बने।
वहाँ रहते हुए राजा नल, विदर्भ की राजकुमारी दमयंती को स्मरण करते हुए, प्रतिदिन सायंकाल यह श्लोक गाया करते थे—
“वह असहाय स्त्री कहाँ होगी, जो भूख-प्यास से पीड़ित और थकान से व्याकुल है, और उस दुष्ट को स्मरण कर रही है? अब वह किसके सहारे जी रही होगी?”
जीवल का प्रश्न और नल का उत्तर
उससे अलग होकर वह मूर्ख अत्यंत दुःख में भटकता रहा और शोक से जलता हुआ दिन-रात चैन नहीं पाता। रात में उसे स्मरण कर वह यह श्लोक गाता है।
संपूर्ण पृथ्वी पर भटकने के बाद उसे कहीं आश्रय मिला है, परंतु जो दुःख उसे मिला है, वह उसके योग्य नहीं था। वह अपनी पत्नी को स्मरण करते हुए ही जीवन व्यतीत कर रहा है।
जब उस पर विपत्ति आई, तब उसकी पत्नी उसके साथ वन में चली गई। परंतु उस अल्पबुद्धि पुरुष ने उसे वन में छोड़ दिया। अब वह स्त्री अकेली, मार्ग से अनजान, दुःख सहने में असमर्थ, भूख-प्यास से व्याकुल होकर किसी प्रकार अपने प्राणों की रक्षा कर रही है।
हे मित्र! उस अल्पभाग्य और मूर्ख पुरुष ने उसे उस भयानक वन में छोड़ दिया है, जो हिंसक पशुओं से भरा हुआ है।”
इस प्रकार दमयंती को स्मरण करते हुए निषध देश के राजा नल, अपने वास्तविक रूप को छिपाकर, उस राजा के महल में अज्ञात रूप से निवास करते रहे।
भीम द्वारा नल और दमयंती की खोज
ऐसा कहे जाने पर वे ब्राह्मण प्रसन्न होकर चारों दिशाओं में नगरों और राज्यों में नल और उनकी पत्नी की खोज में निकल पड़े, परंतु उन्हें कहीं भी नल या दमयंती का पता न चला।
चेदि में दमयंती को एक ब्राह्मण का देखना
बहुत समय बाद, चेदि देश की सुंदर नगरी में, एक ब्राह्मण जिसका नाम था, राजा की पूजा के समय महल में विदर्भ की राजकुमारी को सुन्दना के साथ बैठा हुआ देखा। उसकी अद्भुत शोभा धुएँ में ढकी अग्नि की तरह मंद रूप से प्रकट हो रही थी।
यह सुनकर दमयंती ने अपने सभी संबंधियों का हाल पूछा और सुदेव को देखकर अत्यंत दुःखी होकर रोने लगी।
दमयंती का अपने पिता भीम के पास लौटना
उसने दमयंती के ललाट पर स्थित जन्मचिह्न (तिल) का भी वर्णन किया। यह सुनकर सुनन्दा ने उसके माथे का धूल साफ किया और वह चिह्न चंद्रमा की तरह प्रकट हो गया।
रानी ने प्रसन्न होकर अनुमति दी और उसे उत्तम वस्त्र, भोजन और सुरक्षा के साथ एक सुन्दर पालकी में विदर्भ भेज दिया।
कुछ ही समय में दमयंती विदर्भ पहुँच गई। वहाँ उसके सभी संबंधियों ने उसका आदरपूर्वक स्वागत किया। अपने माता-पिता, बच्चों और सेविकाओं को कुशल देखकर उसने देवताओं और ब्राह्मणों की विधिपूर्वक पूजा की।
राजा भीम अपनी पुत्री को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और सुदेव को हजार गायें, बहुत सा धन और एक गाँव देकर सम्मानित किया।
भीम द्वारा नल की पुनः खोज का आदेश
यह सुनकर राजा ने ब्राह्मणों को चारों दिशाओं में भेजा और कहा—“नल को खोजने का पूरा प्रयत्न करो।”
दमयंती का संदेश
यदि कोई इस पर उत्तर दे, तो तुम उसे अवश्य पहचानना, उसका नाम, स्थान और स्थिति जानना, और उसके शब्द मेरे पास लाना। साथ ही सावधानी रखना कि कोई यह न जान सके कि यह संदेश मेरे द्वारा दिया गया है।”
इस प्रकार निर्देश पाकर ब्राह्मण नल की खोज में निकल पड़े और जहाँ-जहाँ गए, वहाँ यह संदेश सुनाते रहे।
पर्णाद का समाचार
यह सुनकर दमयंती को गहरा संदेह हुआ कि वही बहुक वास्तव में नल हैं।
दमयंती की गुप्त योजना
ऋतुपर्ण का प्रस्थान
नल (बहुक) की अद्भुत अश्वविद्या
बहुक अस्तबल में गया और घोड़ों को परखा। उसने दुबले परंतु शक्तिशाली, तेज, उच्च कुल के, सिंधु देश के घोड़ों को चुना।
राजा ने आश्चर्य से कहा—“ये कमजोर घोड़े हमें कैसे ले जाएँगे?”
बहुक ने उत्तर दिया—“ये घोड़े अत्यंत सक्षम हैं, आप निश्चिंत रहें।”
फिर उसने चार उत्तम घोड़ों को रथ में जोता। जैसे ही राजा रथ पर बैठे, वे घोड़े पहले झुक गए, पर नल ने उन्हें संभाला और वे वायु के समान वेग से दौड़ पड़े।
उनकी गति इतनी तीव्र थी कि वे मानो आकाश में उड़ रहे हों।
वरष्णेय का संदेह
इस प्रकार वह सोच में डूब गया।
राजा ऋतुपर्ण भी बहुक की अद्भुत कला देखकर अत्यंत प्रसन्न और आश्चर्यचकित हुए।
कली नल को छोड़ देता है
राजा ने सहमति दी और उसे जुए की विद्या सिखा दी।
जैसे ही नल ने यह विद्या प्राप्त की, उसके शरीर से बाहर निकल गया, और वह सर्प के विष को उगलता हुआ बाहर आया।
नल ने उसे क्षमा कर दिया। तब कली विभीतक वृक्ष में प्रवेश कर गया।
इस प्रकार कली से मुक्त होकर नल आनंदित हुआ और तेज गति से रथ को विदर्भ की ओर ले चला।
विदर्भ में ऋतुपर्ण का आगमन
संध्या के समय जब ऋतुपर्ण विदर्भ पहुँचे, तो लोगों ने राजा को सूचना दी।
भीम के आमंत्रण पर ऋतुपर्ण कुंडिनपुर में प्रवेश किया। रथ की ध्वनि से चारों दिशाएँ गूँज उठीं। उस ध्वनि को सुनकर नल के पुराने घोड़े प्रसन्न हो उठे, जैसे पहले नल के समय होते थे।
दमयंती द्वारा बहुक की परीक्षा
केशिनी ने जाकर बहुक से प्रश्न किए। उसने बताया कि वह ऋतुपर्ण का सारथि है।
बहुक (नल) के चमत्कार
केशिनी ने लौटकर दमयंती को बताया—
- वह बिना झुके संकरे स्थान से निकल जाता है
- उसके आने से मार्ग स्वयं चौड़ा हो जाता है
- बिना आग के अग्नि प्रकट कर देता है
- जल स्वयं उपस्थित हो जाता है
- फूल दबाने पर और सुगंधित हो जाते हैं
यह सुनकर दमयंती को विश्वास हो गया कि बहुक ही नल है।
नल की पहचान और भावुक मिलन
दमयंती और नल का पुनर्मिलन
माता ने यह बात राजा भीम को बताई। उनकी अनुमति मिलने पर दमयंती ने नल को अपने कक्ष में बुलवा लिया।
नल-दमयंती कथा — हिन्दी अनुवाद
जैसे ही राजा नल ने दमयंती को अचानक देखा, वे अत्यन्त शोक और दुःख से भर गए और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। दमयंती भी नल को उस अवस्था में देखकर अत्यन्त व्याकुल हो उठीं। लाल वस्त्र धारण किए, जटाएँ बाँधे, धूल-मिट्टी से आच्छादित दमयंती ने बहुक से कहा—
“हे बहुक! क्या तुमने कभी किसी ऐसे धर्मज्ञ पुरुष को देखा है, जो अपनी सोती हुई पत्नी को वन में छोड़कर चला गया हो? नल जैसे धर्मात्मा के अतिरिक्त और कौन ऐसा कर सकता था कि अपनी प्रिय और निर्दोष पत्नी को, जो थकान से सो गई थी, वन में छोड़कर चला जाए? मैंने ऐसा कौन-सा अपराध किया था कि उसने मुझे सोते समय ही त्याग दिया? जिसे मैंने देवताओं से भी बढ़कर चुना था, वह अपनी स्नेहशील और समर्पित पत्नी, जो उसके बच्चों की माता भी थी, उसे कैसे छोड़ सकता है? अग्नि और देवताओं के समक्ष उसने मेरा हाथ पकड़कर प्रतिज्ञा की थी—‘मैं तुम्हारा हूँ।’ वह वचन कहाँ गया जब उसने मुझे त्याग दिया?”
यह कहते-कहते दमयंती की आँखों से आँसू बहने लगे। नल ने भी उन्हें दुःख में देखकर आँसू बहाते हुए कहा—
“हे भयभीत सुन्दरी! न तो राज्य का नाश मेरा कर्म था और न ही तुम्हें छोड़ना। यह सब कली का प्रभाव था। तुमने वन में मेरे लिए विलाप करते हुए कली को शाप दिया था, उसी शाप के कारण वह मेरे शरीर में निवास करने लगा और भीतर ही भीतर मुझे जलाता रहा। तुम्हारे शाप की अग्नि में वह मेरे भीतर ऐसे जलता रहा जैसे अग्नि में अग्नि। अब मैंने अपने तप और संयम से उसे जीत लिया है और वह मुझे छोड़ चुका है, इसलिए मैं यहाँ आया हूँ। मेरा उद्देश्य केवल तुम्हारे पास आना था। परन्तु क्या कोई स्त्री अपने पति को छोड़कर दूसरा पति चुन सकती है? राजा के आदेश से दूत पूरे पृथ्वी पर यह घोषणा कर रहे हैं कि ‘भीम की पुत्री दमयंती स्वयं दूसरा पति चुनेगी।’ यह सुनकर ही मैं यहाँ आया हूँ।”
नल की बात सुनकर दमयंती भय और विनम्रता से हाथ जोड़कर बोली—
“आप मेरे ऊपर दोष का संदेह न करें। मैंने देवताओं को छोड़कर आपको पति चुना था। आपको खोजने के लिए ही ब्राह्मणों को चारों दिशाओं में भेजा गया था। अंततः पर्णाद नामक ब्राह्मण ने आपको ऋतुपर्ण के महल में पाया। आपके उत्तर से मुझे निश्चय हुआ, तभी मैंने यह योजना बनाई। आपके अतिरिक्त कोई भी एक दिन में सौ योजन की दूरी तय नहीं कर सकता। आपके चरणों की शपथ लेकर कहती हूँ कि मैंने मन से भी कोई पाप नहीं किया। यदि मैंने पाप किया हो तो वायु, सूर्य और चन्द्रमा मेरे प्राण ले लें।”
तब आकाश से वायु देव ने कहा—
“हे नल! दमयंती ने कोई पाप नहीं किया। उसने तुम्हारे कुल की मर्यादा बढ़ाई है। हम तीन वर्षों से उसके रक्षक रहे हैं। यह योजना उसी ने तुम्हें पाने के लिए बनाई है, क्योंकि तुम्हारे अतिरिक्त कोई इतनी दूरी एक दिन में तय नहीं कर सकता। अब संदेह त्याग कर उससे मिलो।”
यह सुनते ही पुष्पवृष्टि होने लगी, आकाश में मंगल ध्वनियाँ गूँज उठीं और सुगन्धित पवन बहने लगा। नल ने संदेह त्याग दिया और सर्पराज के स्मरण से अपना दिव्य रूप पुनः प्राप्त कर लिया। दमयंती ने अपने वास्तविक रूप में नल को देखकर उन्हें गले लगा लिया और रोने लगी। नल ने भी उसे और अपने बच्चों को आलिंगन किया और अत्यन्त आनन्दित हुए।
उस रात्रि दोनों ने अपने वनवास के दुःखद प्रसंगों को स्मरण करते हुए सुखपूर्वक समय बिताया। चार वर्ष बाद नल और दमयंती का पुनर्मिलन हुआ और वे अत्यन्त प्रसन्न रहने लगे।
प्रातःकाल नल ने ससुर राजा भीम को प्रणाम किया। भीम ने उन्हें पुत्रवत् स्नेह दिया। नगर में हर्ष छा गया—सड़कों को सजाया गया, पुष्पों से अलंकृत किया गया और उत्सव मनाया गया।
राजा ऋतुपर्ण ने नल से क्षमा माँगी और नल ने भी उन्हें क्षमा कर दिया। दोनों ने एक-दूसरे को अपनी-अपनी विद्या प्रदान की—नल ने अश्वविद्या और ऋतुपर्ण ने पासा विद्या।
इसके बाद नल दमयंती के साथ अपने राज्य लौटे। उन्होंने अपने भाई पुष्कर को पुनः द्यूत के लिए ललकारा। इस बार नल ने विजय प्राप्त की और अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। उन्होंने पुष्कर को क्षमा कर दिया और उसे उसका भाग भी दे दिया।
राजा नल ने पुनः अपने राज्य का शासन संभाला, अनेक यज्ञ किए और प्रजा को सुखी रखा। दमयंती के साथ वे पुनः आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे, जैसे देवता स्वर्ग में आनंदित रहते हैं।

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