प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष – शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर | अध्याय 4 : आर्य और राज गिद्ध का आकाशीय युद्ध

 

प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष – शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर | अध्याय 4 : आर्य और राज गिद्ध का आकाशीय युद्ध

प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष

शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर

अध्याय 4 – आर्य और राज गिद्ध का आकाशीय युद्ध

पृथ्वी की जली हुई सतह पर उस समय भयंकर दृश्य उपस्थित था। आकाश में राख के बादल घूम रहे थे और नीचे टूटे हुए शहरों के खंडहर मौन खड़े थे। इसी वीरान संसार में मानवता का भविष्य तय होने वाला था।

विशाल पक्षी राज गिद्ध आकाश में उछल रहा था और उसके पंखों से लटककर आर्य उसे रोकने का प्रयास कर रहा था।

राज गिद्ध ने क्रोध से एक भयानक चीख मारी। उसकी आवाज़ इतनी तीव्र थी कि आसपास के टूटे हुए भवनों की दीवारें तक काँप उठीं।

उसने अपने विशाल पंखों को जोर से झटका।

आर्य हवा में उछल गया, लेकिन उसने तुरंत ही अपने शरीर को संतुलित किया और फिर से राज गिद्ध के पंखों को पकड़ लिया।

अब दोनों के बीच संघर्ष और तीव्र हो गया।

राज गिद्ध ऊपर-ऊपर उड़ने लगा। वह इतनी ऊँचाई पर पहुँच गया जहाँ से पूरी धरती एक काली राख के समुद्र की तरह दिखाई देती थी।

परंतु आश्चर्य की बात यह थी कि आर्य को ऊँचाई या ठंड से कोई भय नहीं था। उसका शरीर उसी संसार के लिए बनाया गया था।

उसने अपनी पूरी शक्ति से राज गिद्ध के पंख को मोड़ने का प्रयास किया।

राज गिद्ध दर्द से चिल्लाया।

उसने अपने तीक्ष्ण पंजों से आर्य को पकड़ने की कोशिश की, पर आर्य की गति अत्यंत तेज थी।

कुछ क्षणों के लिए ऐसा लगा मानो आकाश में दो दैत्य युद्ध कर रहे हों।


दैत्यराज की दृष्टि

उसी समय पृथ्वी की सतह पर एक जले हुए पर्वत की चोटी पर दैत्यराज निशाचर खड़ा था।

उसका विशाल शरीर काले पत्थर जैसा दिखाई देता था। उसकी आँखों में एक भयानक लाल चमक थी।

वह दूर आकाश में चल रहे उस युद्ध को देख रहा था।

उसके आसपास उसके अनुयायी दैत्य खड़े थे।

उनमें से एक बोला—

“महाराज… वह मनुष्य असाधारण शक्ति वाला है।”

निशाचर मुस्कुराया।

“हाँ… यह वही होगा जिसे शिवा ने बनाया है।”

फिर उसने धीरे से कहा—

“तो मानवों ने नया खेल शुरू कर दिया है।”

उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया—

“सभी दैत्य सेना को तैयार करो। यदि यह नया योद्धा जीवित रहा तो वह हमारे लिए बड़ा संकट बन सकता है।”


आकाश में निर्णायक क्षण

उधर आकाश में संघर्ष अपने चरम पर पहुँच चुका था।

राज गिद्ध अब क्रोध से पागल हो चुका था। उसने अचानक अपने पंख समेट लिए और तेजी से नीचे गिरने लगा।

आर्य समझ गया कि वह उसे धरती से टकराकर समाप्त करना चाहता है।

कुछ ही क्षणों में दोनों तेजी से नीचे गिरने लगे।

नीचे धरती के खंडहर तेजी से पास आने लगे।

अचानक आर्य ने एक साहसिक निर्णय लिया।

उसने अपने शरीर को घुमाकर राज गिद्ध की गर्दन को पकड़ लिया और अपनी पूरी शक्ति से उसे मोड़ दिया।

राज गिद्ध दर्द से तड़प उठा।

उसने अपने पंख फैलाए और किसी तरह संतुलन बनाने की कोशिश की।

लेकिन अब वह पहले जैसा शक्तिशाली नहीं लग रहा था।

आर्य ने अवसर देखकर उसके शरीर से छलांग लगा दी।

वह तेजी से नीचे गिरा, लेकिन अंतिम क्षण में उसने एक टूटे हुए भवन की छत पर उतरकर अपने को संभाल लिया।

उधर राज गिद्ध घायल होकर दूर आकाश में उड़ गया।

उसकी भयानक चीख पूरे क्षेत्र में गूँजती रही।


युद्ध का पहला परिणाम

कुछ देर तक चारों ओर सन्नाटा छाया रहा।

आर्य खंडहरों के बीच खड़ा था।

उसने आकाश की ओर देखा जहाँ राज गिद्ध दूर क्षितिज में गायब हो चुका था।

उसके शरीर पर कुछ घाव थे, पर वह अभी भी पूरी तरह स्थिर और शक्तिशाली दिखाई दे रहा था।

उसी समय भूमिगत नगर जीवन रक्षा के नियंत्रण कक्ष में बैठे शिवा ने उस दृश्य को देखा।

आचार्य वेदांत ने आश्चर्य से कहा—

“उसने राज गिद्ध को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया…”

शिवा की आँखों में पहली बार आशा की चमक दिखाई दी।

उन्होंने धीरे से कहा—

“मानवता अभी समाप्त नहीं हुई है।”


एक नई चुनौती

लेकिन उसी समय नियंत्रण कक्ष की स्क्रीन पर एक नया दृश्य दिखाई दिया।

पृथ्वी की सतह पर दूर-दूर तक धूल का तूफान उठ रहा था।

सैकड़ों… हजारों… दैत्य उस दिशा में बढ़ते दिखाई दे रहे थे।

आचार्य वेदांत घबराकर बोले—

“यह दैत्य सेना है!”

शिवा ने गंभीर स्वर में कहा—

“निशाचर स्वयं युद्ध में उतरने वाला है।”

उधर खंडहरों के बीच खड़ा आर्य भी उस धूल के तूफान को देख रहा था।

उसने अपनी मुट्ठियाँ कस लीं।

अब उसका सामना केवल एक पक्षी से नहीं था।

अब उसके सामने पूरी दैत्य सेना आने वाली थी।

और उसी के साथ मानवता के भविष्य का सबसे भयानक युद्ध शुरू होने वाला था।


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