The construction and inauguration of Maya Sabha in Indraprastha हिन्दी में पुरा पढ़े

 

The construction and inauguration of Maya Sabha in Indraprastha

The construction and inauguration of Maya Sabha in Indraprastha

Krishna asks Maya to build an exquisite assembly hall for the Pandavas

Then, in the presence of Vasudeva, Maya Danava, having worshipped Arjuna, repeatedly spoke unto him with joined hands and in amiable words, “O son of Kunti, saved have I been by you from this Krishna in spate and from Pavaka desirous of consuming me. Tell me what I have to do for you.”

Arjuna said, “O great Asura, everything has already been done by you. Blessed be you. Go wherever you like. Be kind and well-disposed towards me, as we are even kind to and well-pleased with you!”

मायासभा का निर्माण और उद्घाटन (भाग 1)

कृष्ण द्वारा मय को सभा निर्माण का आदेश

वासुदेव की उपस्थिति में, मय दानव ने अर्जुन की पूजा करके हाथ जोड़कर विनम्र शब्दों में कहा— “हे कुन्तीपुत्र! आपने मुझे इस प्रचंड कृष्ण और मुझे भस्म करने की इच्छा रखने वाली अग्नि से बचाया है। अब बताइए कि मैं आपके लिए क्या करूँ?”

अर्जुन बोले— “हे महान असुर! तुमने जो करना था, वह सब कर दिया है। तुम जहाँ चाहो जा सकते हो। तुम हमारे प्रति वैसे ही स्नेही रहो, जैसे हम तुम्हारे प्रति हैं।”

मय ने कहा— “हे श्रेष्ठ पुरुष! आपके वचन आपके अनुरूप हैं। फिर भी मैं आपके लिए कुछ करना चाहता हूँ। मैं एक महान शिल्पी हूँ, दानवों का विश्वकर्मा हूँ। अतः मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ।”

अर्जुन बोले— “हे निष्पाप! यदि तुम स्वयं को बचा हुआ मानते हो, तो मैं तुम्हें कोई कार्य नहीं दे सकता। परन्तु मैं तुम्हारी इच्छा को व्यर्थ भी नहीं करना चाहता। तुम श्रीकृष्ण के लिए कुछ करो, वही मेरे लिए पर्याप्त होगा।”

तब मय के आग्रह पर कृष्ण ने कुछ समय विचार किया और बोले— “हे मय! यदि तुम धर्मात्मा युधिष्ठिर के लिए कुछ करना चाहते हो, तो एक ऐसी अद्भुत सभा बनाओ, जिसे मनुष्य देखकर भी बना न सकें। उसमें देव, असुर और मानव—तीनों प्रकार की कला का संगम हो।”

माया द्वारा निर्माण की तैयारी

कृष्ण के वचन सुनकर मय अत्यन्त प्रसन्न हुआ। तब कृष्ण और अर्जुन ने युधिष्ठिर को सारी बात बताई और मय को उनके सामने प्रस्तुत किया।

युधिष्ठिर ने मय का आदरपूर्वक स्वागत किया। मय ने भी उस सम्मान को स्वीकार किया और पाण्डवों को दानव वृषपर्वा की कथा सुनाई।

इसके बाद मय ने गहन योजना बनाकर सभा निर्माण का कार्य आरम्भ किया।

शुभ मुहूर्त में उसने भूमि पूजन किया और हजारों ब्राह्मणों को खीर और अन्य पदार्थों से तृप्त किया। उसने 5000 हाथ क्षेत्रफल वाली भूमि को नापा जो अत्यन्त सुंदर और सभी ऋतुओं के अनुकूल थी।

श्रीकृष्ण का द्वारका लौटने का निर्णय

जनार्दन श्रीकृष्ण, जो सभी के पूजनीय हैं, कुछ समय तक खाण्डवप्रस्थ में सुखपूर्वक रहे। पाण्डवों द्वारा उन्हें अत्यन्त प्रेम और सम्मान मिला।

एक दिन उन्होंने अपने पिता से मिलने के लिए द्वारका जाने की इच्छा व्यक्त की। तब उन्होंने युधिष्ठिर और कुन्ती को प्रणाम किया और अपनी बुआ कुन्ती के चरणों में सिर झुकाया।

कुन्ती ने प्रेमपूर्वक उनका मस्तक सूँघा और उन्हें गले लगाया।

सुभद्रा, द्रौपदी और अन्य से विदाई

श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा के पास गए, उनकी आँखों में आँसू थे। उन्होंने उसे स्नेहपूर्ण और सत्य वचन कहे।

सुभद्रा ने भी उन्हें प्रणाम किया और अपने ससुराल वालों के लिए संदेश दिए।

इसके बाद श्रीकृष्ण ने द्रौपदी और धौम्य ऋषि से भेंट की। उन्होंने धौम्य को प्रणाम किया और द्रौपदी को सांत्वना देकर उनसे विदा ली।

यात्रा की तैयारी

श्रीकृष्ण ने यात्रा से पहले स्नान किया, आभूषण धारण किए और देवताओं तथा ब्राह्मणों की पूजा की।

उन्होंने पुष्प, मंत्र और सुगंधित द्रव्यों से देवताओं का पूजन किया और ब्राह्मणों को दान देकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया।

दिव्य रथ पर प्रस्थान

तत्पश्चात श्रीकृष्ण अपने दिव्य रथ पर सवार हुए, जिस पर गरुड़ का ध्वज था और जिसमें गदा, चक्र, धनुष शारंग आदि अस्त्र-शस्त्र थे।

उनके रथ में सैव्य और सुग्रीव नामक घोड़े जुते हुए थे।

पाण्डवों का साथ और प्रेम

युधिष्ठिर प्रेमवश स्वयं रथ पर चढ़ गए और सारथी दारुक को हटाकर स्वयं लगाम संभाली।

अर्जुन ने श्वेत चामर से श्रीकृष्ण को हवा की। भीम, नकुल, सहदेव तथा नागरिक भी उनके पीछे-पीछे चले।

श्रीकृष्ण उस समय ऐसे शोभायमान थे जैसे देवताओं के बीच इन्द्र।

मार्ग में विदाई

कुछ दूरी तक साथ चलने के बाद श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से आगे न आने का अनुरोध किया।

उन्होंने युधिष्ठिर के चरण स्पर्श किए, परन्तु युधिष्ठिर ने उन्हें उठाकर गले लगा लिया।

इसके बाद श्रीकृष्ण ने सभी पाण्डवों को गले लगाया और उनसे विदा ली।

वियोग का क्षण

पाण्डव अत्यन्त प्रेम से श्रीकृष्ण को जाते हुए देखते रहे। जब वे दृष्टि से ओझल हो गए, तब भी उनके मन उन्हीं के साथ थे।

अन्ततः वे भारी मन से वापस अपने नगर लौट आए।

श्रीकृष्ण का द्वारका आगमन

श्रीकृष्ण शीघ्र ही द्वारका पहुँचे। वहाँ उनका स्वागत उग्रसेन और अन्य यदुवंशियों ने किया।

उन्होंने अपने माता-पिता का सम्मान किया, बलराम को प्रणाम किया और अपने परिजनों से मिलकर प्रसन्न हुए।

अन्त में वे रुक्मिणी के महल में गए और विश्राम किया।

माया दानव का कैलाश की ओर प्रस्थान

माया दानव ने अर्जुन से कहा— “अब मैं आपकी आज्ञा से जा रहा हूँ, पर शीघ्र ही लौट आऊँगा। कैलाश पर्वत के उत्तर में मैनाक पर्वत के समीप बिंदु नामक एक सरोवर है। वहाँ दानवों द्वारा यज्ञ किया गया था।

उस स्थान पर मैंने पहले ही बहुत से अद्भुत रत्न, मणियाँ और निर्माण सामग्री एकत्र की थी। वह सब वृषपर्वा के भवन में सुरक्षित रखा गया है। यदि वह अभी भी वहाँ होगा, तो मैं उसे लेकर लौटूँगा और पाण्डवों के लिए अद्भुत सभा का निर्माण करूँगा।”

विशेष गदा और शंख का वर्णन

मय ने आगे कहा— “वहाँ एक भयानक गदा भी है, जो अत्यन्त भारी और शक्तिशाली है। उसमें सोने की जड़ाई है और वह एक लाख गदाओं के समान बलशाली है। वह भीमसेन के लिए उपयुक्त है।”

“इसके अतिरिक्त वहाँ ‘देवदत्त’ नामक एक विशाल शंख भी है, जिसकी ध्वनि अत्यन्त प्रचण्ड है। वह अर्जुन के लिए उपयुक्त होगा।”

दिव्य स्थानों का वर्णन

मय उत्तर-पूर्व दिशा में कैलाश की ओर गया। वहाँ हिरण्यशृंग नामक रत्नों से भरा पर्वत है और उसके पास बिंदु सरोवर है।

उसी स्थान पर राजा भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए तप किया था। वहीं इन्द्र ने सौ यज्ञ किए थे।

वहाँ महादेव निवास करते हैं और नार-नारायण, ब्रह्मा, यम आदि देवता भी यज्ञ करते हैं।

मय द्वारा सामग्री लाना

मय दानव ने वहाँ जाकर रत्न, मणियाँ, गदा और शंख प्राप्त किए। यक्ष और राक्षस उस धन की रक्षा कर रहे थे, परन्तु मय ने सब कुछ प्राप्त कर लिया।

वह सब सामग्री लेकर वापस आया और पाण्डवों के लिए अद्भुत सभा का निर्माण प्रारम्भ किया।

मयसभा का निर्माण

मय ने जो सभा बनाई, वह अद्भुत थी। उसमें स्वर्ण के स्तम्भ थे और उसका क्षेत्रफल पाँच हजार हाथ था।

वह सभा अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी थी। उसकी चमक से सूर्य का प्रकाश भी फीका पड़ता था।

उसका रूप ऐसा था मानो आकाश में नया बादल चमक रहा हो। वह अत्यन्त सुंदर और आकर्षक थी।

राक्षसों द्वारा सुरक्षा

उस सभा की रक्षा के लिए आठ हजार राक्षस नियुक्त थे, जो अत्यन्त बलशाली और आकाश में विचरण करने में सक्षम थे।

दिव्य सरोवर और भ्रम

सभा के भीतर एक सुंदर सरोवर था जिसमें रत्नों से बने कमल और स्वर्णिम पुष्प थे। उसमें मछलियाँ और कछुए भी थे।

उसका जल इतना स्वच्छ था कि लोग उसे भूमि समझकर उसमें गिर जाते थे।

उसके चारों ओर संगमरमर और मोतियों से सजे हुए तट थे।

उद्यान और वृक्ष

सभा के चारों ओर सुंदर वृक्ष लगाए गए थे, जिनमें सदैव फूल लगे रहते थे। वहाँ कृत्रिम वन भी थे जिनसे सुगंध फैलती रहती थी।

वहाँ हंस, चक्रवाक आदि पक्षी भी थे, जो वातावरण को और भी सुंदर बनाते थे।

निर्माण की पूर्णता

मय दानव ने 14 महीनों में इस अद्भुत सभा का निर्माण पूरा किया और युधिष्ठिर को इसकी सूचना दी।

इस दिव्य सभा में केवल देवता ही नहीं, बल्कि समस्त ज्ञान और अस्तित्व के तत्व भी साकार रूप में उपस्थित रहते हैं। यहाँ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष तथा आनंद, वैराग्य, तप और शांति भी सजीव रूप में ब्रह्मा की सेवा करते हैं।

यह सभा समय और ब्रह्मांड के रहस्यों का केंद्र है। यहाँ क्षण, लव, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष और युग सभी सजीव रूप में उपस्थित रहते हैं।

समय का महान चक्र — जो नाशरहित और अनंत है — भी इस सभा में स्थित रहता है।

यहाँ अनेक दिव्य माताएँ भी उपस्थित हैं — अदिति, दिति, दनु, सुरसा, विनता, कद्रू, गौतमी, सरमा, लक्ष्मी, गंगा, सरस्वती, शची आदि — जो सृष्टि की जननी हैं और ब्रह्मा की सेवा करती हैं।

देवताओं के सभी समूह — आदित्य, वसु, रुद्र, मरुत, अश्विनी कुमार, विश्वदेव, साध्य, पितर — सभी यहाँ उपस्थित होकर ब्रह्मा का पूजन करते हैं।

यहाँ सात प्रकार के पितरों का वर्णन मिलता है — कुछ साकार रूप में और कुछ निराकार रूप में। वे सभी ब्रह्मा के समीप रहकर उन्हें संतुष्ट करते हैं।

इस सभा में केवल देव ही नहीं बल्कि — राक्षस, पिशाच, दानव, नाग, पक्षी, पशु और सभी जीव — सभी ब्रह्मा की आराधना करते हैं।

यहाँ तक कि देवताओं के राजा इंद्र, वरुण, कुबेर, यम, और महादेव (शिव) भी माता पार्वती सहित इस सभा में आते हैं।

भगवान कार्तिकेय तथा स्वयं नारायण (विष्णु) भी यहाँ उपस्थित होकर ब्रह्मा का सम्मान करते हैं।

असंख्य ऋषि — लगभग 80,000 ब्रह्मचारी ऋषि और 50,000 गृहस्थ ऋषि — इस सभा में निवास करते हैं।

यह सभा सदैव गतिशील रहती है — यहाँ निरंतर देवताओं और ऋषियों का आगमन और प्रस्थान होता रहता है।

ब्रह्मा सभी अतिथियों का सम्मान करते हैं — वे उन्हें मधुर वाणी, धन और अन्य सुखद वस्तुओं से संतुष्ट करते हैं।

यह सभा सभी लोकों में अद्वितीय है — जैसे मनुष्यों में किसी राजा की सभा सर्वोत्तम होती है, वैसे ही देवताओं में ब्रह्मा की सभा सबसे महान मानी जाती है।

वक्ता अंत में कहते हैं — "हे भरतवंशी! मैंने इन सभी दिव्य सभाओं को देखा है, परंतु मनुष्यों में तुम्हारी सभा भी अद्वितीय है।"

इस दिव्य सभा में समस्त वेद और ज्ञान के स्रोत साकार रूप में विद्यमान रहते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अपने-अपने स्वरूप में उपस्थित होकर ब्रह्मा की स्तुति करते हैं।

इनके साथ ही समस्त शास्त्र, उपनिषद, वेदांग, इतिहास और पुराण भी सजीव रूप में इस सभा में निवास करते हैं।

यहाँ मंत्र, उपमंत्र, स्तोत्र, ऋचाएँ और सभी प्रकार के वैदिक उच्चारण अपने वास्तविक स्वरूप में उपस्थित रहते हैं और निरंतर गूंजते रहते हैं।

संगीत और काव्य की समस्त विधाएँ — सामगान, छंद, गीत, काव्य, नाटक और विभिन्न भाष्य — भी सजीव रूप में ब्रह्मा की सेवा करती हैं।

यह सभा केवल आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि बौद्धिक ऊर्जा का भी केंद्र है। यहाँ बुद्धि, स्मृति, मेधा, धृति, क्षमा, कीर्ति और प्रज्ञा भी साकार रूप में उपस्थित रहती हैं।

इस सभा में समस्त ग्रह और नक्षत्र भी विद्यमान रहते हैं — सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु तथा सभी नक्षत्र और तारागण ब्रह्मा की परिक्रमा करते हैं।

यहाँ इंद्र सहित सभी लोकपाल तथा देवताओं के गुरु बृहस्पति और दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य भी उपस्थित रहते हैं।

यह सभा सभी यज्ञों और अनुष्ठानों का केंद्र भी है। यहाँ यज्ञ, हवि, सोमरस, आहुति और सभी वैदिक कर्म सजीव रूप में उपस्थित रहते हैं।

विभिन्न प्रकार की विद्याएँ और कलाएँ — चिकित्सा, धनुर्वेद, संगीत, वास्तु, ज्योतिष आदि — भी अपने साकार रूप में यहाँ निवास करती हैं।

यहाँ समस्त प्रकृति के तत्व — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — तथा उनके गुण — शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध — भी उपस्थित रहते हैं।

यह सभा संपूर्ण सृष्टि का दर्पण है — जहाँ हर वह वस्तु जो ब्रह्मांड में कहीं भी विद्यमान है, अपने सूक्ष्म या स्थूल रूप में यहाँ उपस्थित होती है।

इस प्रकार ब्रह्मा की यह सभा न केवल देवताओं की, बल्कि सम्पूर्ण ज्ञान, विज्ञान और सृष्टि के तत्वों की सभा है।

इस अद्भुत सभा में अनेक महान ऋषि और तपस्वी निरंतर ब्रह्मा की सेवा में उपस्थित रहते हैं। अगस्त्य, मार्कण्डेय, जमदग्नि, भरद्वाज, च्यवन, दुर्वासा, ऋश्यश्रृंग और सनत्कुमार जैसे महान ऋषि यहाँ निवास करते हैं।

इसके अतिरिक्त असित, देवल, जैगीषव्य जैसे सत्य के ज्ञाता ऋषि भी इस सभा में उपस्थित होकर ब्रह्मा के समीप रहते हैं।

यहाँ कर्दम, प्रजापति, अंगिरस, पुलस्त्य, क्रतु आदि सृष्टि के मूल रचयिता भी सजीव रूप में विद्यमान रहते हैं।

समस्त ऋषि परंपराएँ — ब्रह्मर्षि, देवर्षि और राजर्षि — अपनी-अपनी शक्तियों सहित इस सभा में उपस्थित रहती हैं।

इस सभा में केवल ऋषि ही नहीं बल्कि आयुर्वेद और उसके आठ अंग भी सजीव रूप में विद्यमान रहते हैं, जो समस्त प्राणियों के स्वास्थ्य और जीवन का प्रतिनिधित्व करते हैं।

यहाँ चंद्रमा अपने सभी नक्षत्रों के साथ, और सूर्य (आदित्य) अपनी समस्त किरणों सहित उपस्थित रहते हैं।

सभी दिशाएँ, वायु, प्रकाश और ऊर्जा के स्रोत इस सभा में एकत्र होकर ब्रह्मा के अधीन कार्य करते हैं।

यहाँ संकल्प (इच्छा), प्राण (जीवन शक्ति), तप (ऊर्जा), और सृष्टि की मूल प्रेरणा भी साकार रूप में विद्यमान रहती हैं।

इस सभा में प्रत्येक तत्व — चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक — अपनी पूर्ण चेतना के साथ उपस्थित होता है।

यहाँ उपस्थित प्रत्येक सत्ता ब्रह्मा की आज्ञा का पालन करती है, और सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने में अपना योगदान देती है।

इस प्रकार यह सभा केवल एक स्थान नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड का संचालन केंद्र है।

यहाँ सभी शक्तियाँ एक साथ समन्वित होकर कार्य करती हैं, जिससे सृष्टि का क्रम निरंतर चलता रहता है।

इस दिव्य सभा में समय का रहस्य अत्यंत गूढ़ रूप में प्रकट होता है। यहाँ क्षण, लव, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, ऋतु और वर्ष सभी सजीव रूप में विद्यमान रहते हैं।

समय के ये सभी भाग ब्रह्मा की आज्ञा से कार्य करते हैं और सृष्टि के क्रम को नियमित रूप से आगे बढ़ाते हैं।

यहाँ युग — सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग भी साकार रूप में उपस्थित रहते हैं।

इनके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के दिव्य समय — देवताओं का दिन-रात, पितरों का दिन-रात और ब्रह्मा का दिन-रात — भी यहाँ विद्यमान रहते हैं।

इस सभा में कालचक्र (समय का महान चक्र) सदा घूमता रहता है, जो नाशरहित, अनंत और अविनाशी है।

यह कालचक्र ही सृष्टि, पालन और संहार के क्रम को नियंत्रित करता है।

यहाँ धर्मचक्र भी विद्यमान है, जो सृष्टि में न्याय, संतुलन और नैतिकता को बनाए रखता है।

धर्म और अधर्म, पुण्य और पाप, इन सभी का संतुलन इसी सभा में निर्धारित होता है।

यह सभा समय और कर्म के गूढ़ संबंधों का केंद्र है, जहाँ प्रत्येक जीव के कर्मों का सूक्ष्म लेखा-जोखा रखा जाता है।

यहाँ नियति (भाग्य) और संयोग (circumstance) भी सजीव रूप में उपस्थित रहते हैं।

ये सभी मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक जीव को उसके कर्मों के अनुसार फल प्राप्त हो।

इस प्रकार ब्रह्मा की यह सभा केवल सृष्टि का निर्माण ही नहीं, बल्कि उसके संचालन, समय-चक्र और न्याय व्यवस्था का भी केंद्र है।

इस दिव्य सभा में सृष्टि की मूल जननी शक्तियाँ भी साकार रूप में उपस्थित रहती हैं। यहाँ अदिति, दिति, दनु, सुरसा, विनता, कद्रू आदि देवमाताएँ विद्यमान हैं।

ये सभी माताएँ देवताओं, दानवों, नागों और विभिन्न प्राणियों की उत्पत्ति का कारण हैं, और सृष्टि के संतुलन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इस सभा में गौ माता (सुरभि) भी उपस्थित रहती हैं, जो समस्त जीवों के पालन-पोषण का प्रतीक हैं।

यहाँ सरमा तथा अन्य दिव्य माताएँ भी हैं, जो विभिन्न जीव-जातियों की संरक्षक मानी जाती हैं।

इसके अतिरिक्त लक्ष्मी (समृद्धि की देवी), श्री, भद्रा, षष्ठी, और पृथ्वी देवी भी इस सभा में निवास करती हैं।

गंगा और अन्य पवित्र नदियाँ भी देवी रूप में उपस्थित होकर ब्रह्मा की सेवा करती हैं।

यहाँ ह्री (लज्जा), स्वाहा, स्वधा, पुष्टि, श्रद्धा जैसी दिव्य शक्तियाँ भी साकार रूप में विद्यमान रहती हैं।

ये सभी शक्तियाँ यज्ञ, तप, आहार और जीवन के पोषण से जुड़ी हुई हैं, और सृष्टि के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इस सभा में नियति (भाग्य), सृष्टि (creation), रति (प्रेम) और अन्य सूक्ष्म भावनात्मक एवं ब्रह्मांडीय शक्तियाँ भी उपस्थित रहती हैं।

ये सभी देवियाँ और शक्तियाँ मिलकर सृष्टि के निर्माण, पालन और संतुलन को सुनिश्चित करती हैं।

इस प्रकार ब्रह्मा की सभा में केवल देवता ही नहीं, बल्कि सृष्टि की प्रत्येक जननी शक्ति भी अपनी पूर्ण चेतना के साथ उपस्थित रहती है।

इस दिव्य सभा में समस्त देवगण अपने-अपने स्वरूप में उपस्थित रहते हैं। यहाँ आदित्य, वसु, रुद्र, मरुत, अश्विनी कुमार और विश्वदेव तथा साध्य निरंतर ब्रह्मा की आराधना करते हैं।

देवताओं के राजा इंद्र (पुरंदर) इस सभा में विशेष स्थान रखते हैं और अन्य देवताओं के साथ ब्रह्मा की सेवा करते हैं।

इसके अतिरिक्त वरुण, कुबेर, यम जैसे लोकपाल भी नियमित रूप से इस सभा में उपस्थित होकर ब्रह्मा का सम्मान करते हैं।

इस सभा में महादेव (शिव) अपनी अर्धांगिनी पार्वती के साथ आते हैं, और ब्रह्मा के साथ मैत्रीपूर्ण भाव से स्थित रहते हैं।

कार्तिकेय (महासेन) भी इस सभा में उपस्थित होकर ब्रह्मा की वंदना करते हैं।

यहाँ भगवान नारायण (विष्णु) भी अपने दिव्य स्वरूप में ब्रह्मा के साथ स्थित रहते हैं।

इस सभा में सात प्रकार के पितरों का भी वर्णन मिलता है — कुछ साकार और कुछ निराकार रूप में।

इनमें अग्निष्वात्त, बार्हिषद, सोमप आदि प्रमुख पितर ब्रह्मा की सेवा में उपस्थित रहते हैं।

ये पितर पहले स्वयं सोम का सेवन करते हैं और फिर अन्य प्राणियों को तृप्त करते हैं, जिससे सृष्टि का पोषण होता है।

इस सभा में राक्षस, पिशाच, दानव, नाग, पक्षी और अन्य सभी जीव भी अपने-अपने स्वरूप में उपस्थित होकर ब्रह्मा की आराधना करते हैं।

यहाँ समस्त चर और अचर प्राणी — जो चलते हैं और जो स्थिर हैं — सभी ब्रह्मा के अधीन होकर उनकी पूजा करते हैं।

इस प्रकार यह सभा सम्पूर्ण सृष्टि का प्रतिनिधित्व करती है, जहाँ प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक लोक और प्रत्येक जीव अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।

इस प्रकार ब्रह्मा की यह दिव्य सभा सम्पूर्ण सृष्टि का सार और केंद्र है, जहाँ प्रत्येक शक्ति, प्रत्येक तत्व और प्रत्येक प्राणी अपनी उपस्थिति के साथ स्थित है।

यह सभा केवल एक स्थान नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड की चेतना और व्यवस्था का जीवंत स्वरूप है।

यहाँ ब्रह्मा, जो सृष्टि के आदि कारण हैं, सभी प्राणियों के साथ समान व्यवहार करते हैं।

वे देवताओं, दानवों, नागों, मनुष्यों, ऋषियों और अन्य सभी प्राणियों का सम्मानपूर्वक स्वागत करते हैं और उन्हें उनके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं।

इस सभा में आने वाले प्रत्येक अतिथि का मधुर वाणी, आदर और दान से सत्कार किया जाता है।

यहाँ कोई भेदभाव नहीं है — सभी को समान दृष्टि से देखा जाता है।

यह सभा निरंतर गतिशील है — यहाँ देवताओं, ऋषियों और विभिन्न लोकों के प्राणियों का आगमन और प्रस्थान चलता रहता है।

इस सभा का तेज इतना अद्भुत है कि यह सूर्य, चंद्र और अग्नि के प्रकाश को भी पीछे छोड़ देता है।

यहाँ प्रवेश करने वाले को न भूख लगती है, न प्यास, और न ही कोई शारीरिक या मानसिक कष्ट होता है।

यह पूर्ण आनंद, शांति और दिव्य ऊर्जा का स्थान है।

वक्ता अंत में कहते हैं — "हे भरतवंशी! मैंने देवताओं के लोकों में स्थित इन सभी दिव्य सभाओं को देखा है। वे सभी अद्भुत और अनुपम हैं।"

"परंतु जैसे मनुष्यों के बीच तुम्हारी सभा श्रेष्ठ है, वैसे ही देवताओं के बीच ब्रह्मा की सभा सर्वोच्च और अद्वितीय है।"

इस प्रकार यह कथा ब्रह्मा की सभा की महिमा का वर्णन करते हुए समाप्त होती है, जो सृष्टि के रहस्यों, ज्ञान और दिव्यता का सर्वोच्च प्रतीक है।

Post a Comment

0 Comments