प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष – शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर | अध्याय 5 : दैत्य सेना का आक्रमण

 

प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष – शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर | अध्याय 5 : दैत्य सेना का आक्रमण

प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष

शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर

अध्याय 5– दैत्य सेना का आक्रमण

पृथ्वी की जली हुई सतह पर खड़ा आर्य दूर क्षितिज की ओर देख रहा था। हवा में उड़ती हुई राख और धूल के बीच एक विशाल तूफान उठता दिखाई दे रहा था। धीरे-धीरे वह स्पष्ट होने लगा।

वह कोई साधारण धूल का गुबार नहीं था।

वह थी दैत्य सेना

हजारों आदमखोर दैत्य पृथ्वी की सतह पर दौड़ते हुए उसी दिशा में आ रहे थे जहाँ आर्य खड़ा था। उनके शरीर विशाल और विकृत थे। कुछ के हाथ असामान्य रूप से लंबे थे, कुछ के दाँत तलवार की तरह बाहर निकले हुए थे।

उनकी आँखों में केवल एक ही भावना थी — भूख

वे मानव मांस की गंध पहचान चुके थे।


भूमिगत नगर की चिंता

उधर भूमिगत नगर “जीवन रक्षा” के नियंत्रण कक्ष में बैठे शिवा और उनके वैज्ञानिक भी वही दृश्य देख रहे थे।

दीवार पर लगे विशाल स्क्रीन पर दैत्य सेना स्पष्ट दिखाई दे रही थी।

एक सेनापति चिंतित होकर बोला—

“महाराज, यदि यह सेना हमारे बंकरों का स्थान जान गई तो हमारी पूरी सभ्यता खतरे में पड़ जाएगी।”

आचार्य वेदांत ने कहा—

“हमें आर्य को तुरंत वापस बुला लेना चाहिए।”

लेकिन शिवा शांत बैठे रहे।

उन्होंने स्क्रीन पर खड़े आर्य को देखा।

फिर धीरे से बोले—

“नहीं।”

सभी लोग आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगे।

“यह युद्ध आर्य को ही लड़ना होगा। यदि वह इस परीक्षा में सफल हुआ तो मानवता के लिए आशा बची रहेगी।”


पहला टकराव

कुछ ही समय में दैत्य सेना आर्य के पास पहुँच गई।

उनके नेता ने एक भयानक गर्जना की और पूरी सेना एक साथ उसकी ओर दौड़ पड़ी।

धरती काँप उठी।

परंतु आर्य स्थिर खड़ा रहा।

उसने अपनी मुट्ठियाँ कस लीं और धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

पहला दैत्य उसके पास पहुँचा। वह लगभग दस फुट ऊँचा था और उसके हाथ किसी विशाल हथौड़े की तरह भारी थे।

उसने आर्य पर हमला किया।

पर आर्य बिजली की गति से एक ओर हट गया और उसी क्षण उसने अपनी पूरी शक्ति से उस दैत्य के सीने पर प्रहार किया।

भयंकर आवाज़ के साथ वह दैत्य कई मीटर दूर जाकर गिर पड़ा।

बाकी दैत्य कुछ क्षण के लिए रुक गए।

उन्होंने शायद पहली बार किसी मनुष्य को इतनी शक्ति के साथ देखा था।


भयंकर युद्ध

लेकिन फिर उनकी भूख और क्रोध ने उन्हें फिर से उन्मत्त कर दिया।

वे चारों ओर से आर्य पर टूट पड़े।

अब वहाँ एक भयंकर युद्ध शुरू हो गया।

आर्य एक साथ कई दैत्यों से लड़ रहा था। उसकी गति इतनी तेज थी कि दैत्यों के भारी शरीर उसका पीछा नहीं कर पा रहे थे।

वह कभी एक दैत्य को धराशायी करता, कभी दूसरे को।

लेकिन दैत्यों की संख्या बहुत अधिक थी।

कुछ ही समय में वे उसे चारों ओर से घेरने लगे।

उसी समय आकाश में फिर से एक भयानक चीख गूँजी।

सभी ने ऊपर देखा।

वह था राज गिद्ध

वह घायल था, पर अभी भी जीवित था।

और इस बार वह अकेला नहीं आया था।

उसके पीछे दैत्यराज निशाचर की सेना का एक और दल आ रहा था।


दैत्यराज का आगमन

अचानक दैत्य सेना के बीच रास्ता बनता हुआ एक विशाल शरीर आगे बढ़ा।

वह किसी भी दैत्य से कई गुना बड़ा था।

उसकी ऊँचाई लगभग बारह फुट थी और उसके शरीर पर काले पत्थर जैसी कठोर त्वचा थी।

उसकी आँखों में लाल अग्नि जल रही थी।

वह था —

दैत्यराज निशाचर

पूरी दैत्य सेना उसके सामने झुक गई।

निशाचर धीरे-धीरे आर्य के सामने आया।

कुछ क्षणों तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

फिर निशाचर की भारी आवाज़ गूँजी—

“तो… यही है मानवों की नई आशा।”

आर्य ने शांत स्वर में उत्तर दिया—

“और तुम हो वह अंधकार जिसने इस पृथ्वी को नष्ट किया।”

निशाचर हँस पड़ा।

उसकी हँसी इतनी भयानक थी कि आसपास की धरती काँप उठी।

“मनुष्य… तुम लोग हमेशा से कमजोर रहे हो। इस पृथ्वी पर अब हमारा अधिकार है।”

आर्य ने उत्तर दिया—

“जब तक एक भी मनुष्य जीवित है, यह पृथ्वी तुम्हारी नहीं हो सकती।”


युद्ध की शुरुआत

निशाचर ने अपनी विशाल मुट्ठी उठाई।

“तो आओ… देख लेते हैं कि तुम्हारी शक्ति कितनी है।”

अगले ही क्षण उसने बिजली की गति से आर्य पर प्रहार किया।

आर्य ने उस प्रहार को रोकने की कोशिश की।

दोनों की टक्कर से इतनी भयानक ध्वनि हुई कि आसपास की इमारतों के खंडहर टूटकर गिरने लगे।

यह साधारण युद्ध नहीं था।

यह था —

मानवता और अंधकार का पहला वास्तविक संघर्ष।

और उस युद्ध का परिणाम तय करने वाला था कि पृथ्वी पर भविष्य किसका होगा।


प्रलय युग अध्याय 5

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