The Story of Mahabharata Devayani, Yayati and Sharmishtha part 6

Devayani, Yayati और Sharmishtha – भाग 6

शुक्राचार्य के श्राप से राजा ययाति तत्काल ही वृद्धावस्था से ग्रस्त हो गए। उनका शरीर झुर्रियों से भर गया, बाल श्वेत हो गए और उनकी शक्ति क्षीण हो गई।

तब ययाति ने विनम्र होकर कहा — “हे भगवन्, मैंने अभी तक अपने यौवन का पूर्ण उपभोग नहीं किया है। कृपा करके मुझे इस वृद्धावस्था से मुक्ति का उपाय बताइए।”

शुक्राचार्य बोले — “मैं अपना वचन वापस नहीं ले सकता। परन्तु यदि कोई तुम्हारा पुत्र अपनी युवावस्था तुम्हें दे दे, तो तुम अपनी वृद्धावस्था उसे देकर फिर से युवा हो सकते हो।”

यह सुनकर ययाति अपने राज्य में लौटे और अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को बुलाकर कहा — “हे पुत्र, मेरी यह वृद्धावस्था और दुर्बलता तुम ले लो और अपना यौवन मुझे दे दो। एक हजार वर्ष बाद मैं तुम्हें तुम्हारा यौवन लौटा दूँगा।”

यदु ने उत्तर दिया — “हे पिता, वृद्धावस्था अत्यन्त कष्टदायक होती है। इसमें न तो भोग संभव है, न ही सुख। इसलिए मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता।”

यह सुनकर ययाति ने उसे श्राप दिया — “तुम्हारी संतति कभी राज्य का अधिकारी नहीं होगी।”

फिर ययाति ने तुर्वसु को बुलाया और वही प्रस्ताव रखा। तुर्वसु ने भी इंकार कर दिया।

ययाति ने उसे श्राप दिया — “तुम्हारा वंश नष्ट हो जाएगा और तुम अधर्मियों के बीच राज्य करोगे।”

इसके बाद ययाति ने द्रुह्यु को बुलाया। उसने भी वृद्धावस्था स्वीकार करने से मना कर दिया।

तब ययाति ने उसे श्राप दिया — “तुम ऐसे प्रदेश के राजा बनोगे जहाँ सुख-सुविधाएँ नहीं होंगी।”

फिर उन्होंने अनु को बुलाया। उसने भी वृद्धावस्था को अस्वीकार कर दिया।

ययाति ने उसे श्राप दिया — “तुम्हारी संतान युवा अवस्था में ही मृत्यु को प्राप्त होगी।”

अंत में ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को बुलाया और वही निवेदन किया।

पुरु ने विनम्रता से कहा — “हे पिताश्री, मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। आप मेरी युवावस्था ले लें और अपनी वृद्धावस्था मुझे दे दें।”

यह सुनकर ययाति अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले — “हे पुरु, तुम सबसे श्रेष्ठ पुत्र हो। तुम्हारे राज्य में सबकी इच्छाएँ पूर्ण होंगी।”

तत्पश्चात् ययाति ने अपनी वृद्धावस्था पुरु को दे दी और उसकी युवावस्था स्वयं ग्रहण कर ली।

युवावस्था प्राप्त कर ययाति ने पुनः भोग-विलास में जीवन व्यतीत करना प्रारम्भ किया। उन्होंने हजार वर्षों तक विविध सुखों का उपभोग किया, यज्ञ किए, दान दिए और धर्म का पालन किया।

वे देवताओं को यज्ञों द्वारा, पितरों को श्राद्ध द्वारा, ब्राह्मणों को दान द्वारा और प्रजा को संरक्षण देकर संतुष्ट करते रहे।

किन्तु समय बीतने पर ययाति को यह अनुभव हुआ कि भोगों से कभी तृप्ति नहीं होती।

उन्होंने कहा — “इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं, बल्कि भोग से और अधिक बढ़ती हैं, जैसे अग्नि में घी डालने से वह और प्रज्वलित होती है।”

“यदि किसी व्यक्ति को सम्पूर्ण पृथ्वी का धन, स्त्रियाँ और वैभव भी मिल जाए, तब भी वह संतुष्ट नहीं होता। इसलिए इच्छाओं का त्याग ही सच्चा सुख है।”

तब ययाति ने निश्चय किया कि अब वे वैराग्य धारण करेंगे और वन में जाकर तपस्या करेंगे।

उन्होंने पुरु को बुलाकर कहा — “हे पुत्र, मैंने तुम्हारी युवावस्था का पूर्ण उपयोग कर लिया है। अब मैं तुम्हें तुम्हारा यौवन लौटाता हूँ और स्वयं वन को जाता हूँ।”

उन्होंने पुरु को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया।

जब लोगों ने पूछा कि सबसे छोटे पुत्र को राजा क्यों बनाया जा रहा है, तब ययाति ने कहा — “वही पुत्र श्रेष्ठ होता है जो माता-पिता की आज्ञा का पालन करता है। पुरु ने मेरी आज्ञा मानी, इसलिए वही राज्य का अधिकारी है।”

इस प्रकार पुरु राजा बने और ययाति वन में तपस्या करने चले गए।

(आगे भाग 4 में…)

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