Devayani, Yayati और Sharmishtha – भाग 2
कुछ समय पश्चात् अत्यन्त सुन्दर वर्ण वाली देवयानी उसी वन में विहार करने के लिए गई। उसके साथ शर्मिष्ठा और उसकी हजार दासियाँ भी थीं। वे सब उस स्थान पर पहुँचकर हर्षपूर्वक घूमने लगीं। अपनी सखियों से घिरी हुई देवयानी अत्यन्त प्रसन्न थी।
वे सब फूलों के मधु का पान करने लगीं, विभिन्न प्रकार के फल खाने लगीं और हँसी-खुशी क्रीड़ा करने लगीं। उसी समय नहुष के पुत्र राजा ययाति, जो मृग का पीछा करते-करते थक चुके थे और जल की खोज में वहाँ पहुँचे।
राजा ने देवयानी, शर्मिष्ठा और अन्य कन्याओं को देखा। वे सभी दिव्य आभूषणों से सुसज्जित थीं और फूलों के मधु के कारण उनमें एक प्रकार की मादकता थी। उन सबमें देवयानी सबसे अधिक सुन्दर और उज्ज्वल वर्ण वाली थी, जो आराम से बैठी थी और शर्मिष्ठा उसके चरण दबा रही थी।
यह देखकर ययाति बोले — “हे सुन्दरियों, मैं तुम दोनों के नाम और कुल जानना चाहता हूँ। ऐसा प्रतीत होता है कि ये दो हजार दासियाँ तुम दोनों की सेवा कर रही हैं।”
देवयानी ने उत्तर दिया — “हे राजन्, सुनिए। मैं असुरों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री हूँ। यह मेरी दासी है — शर्मिष्ठा, जो असुरराज वृषपर्वा की पुत्री है और सदा मेरी सेवा करती है।”
ययाति ने आश्चर्य से पूछा — “इतनी उच्च कुल की यह कन्या तुम्हारी दासी कैसे बनी?”
देवयानी बोली — “हे राजन्, यह सब भाग्य का परिणाम है। इसमें आश्चर्य मत कीजिए। अब आप अपना परिचय दीजिए।”
ययाति ने कहा — “मैं नहुष का पुत्र ययाति हूँ। ब्रह्मचर्य काल में मैंने वेदों का अध्ययन किया है।”
देवयानी ने कहा — “हे राजन्, आप यहाँ किस उद्देश्य से आए हैं?”
ययाति बोले — “मैं मृग का पीछा करते हुए थक गया हूँ और जल की खोज में यहाँ आया हूँ।”
देवयानी ने कहा — “मैं और मेरी दासियाँ आपकी सेवा के लिए तत्पर हैं। आप मेरे स्वामी और मित्र बनिए।”
ययाति ने उत्तर दिया — “हे सुन्दरी, तुम शुक्राचार्य की पुत्री हो, मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूँ।”
देवयानी ने कहा — “पूर्व में ब्राह्मण और क्षत्रिय विवाह कर चुके हैं। आपने मेरा हाथ छुआ है, इसलिए अब आप ही मेरे पति होंगे।”
ययाति ने कहा — “मैं बिना तुम्हारे पिता की अनुमति के विवाह नहीं कर सकता।”
तब देवयानी ने अपनी दासी को भेजकर शुक्राचार्य को बुलाया। शुक्राचार्य आए और ययाति का स्वागत किया।
देवयानी ने कहा — “हे पिता, इन्होंने संकट में मेरा हाथ पकड़ा था। मैं इन्हें ही पति रूप में स्वीकार करती हूँ।”
शुक्राचार्य ने कहा — “हे ययाति, मैं अपनी पुत्री तुम्हें देता हूँ।”
ययाति ने कहा — “इससे उत्पन्न दोष से मुझे बचाइए।”
शुक्राचार्य बोले — “मैं तुम्हें इस दोष से मुक्त करता हूँ। परन्तु ध्यान रखना, शर्मिष्ठा को कभी अपने शयन में न बुलाना।”
इसके बाद ययाति और देवयानी का विवाह हुआ और वे राज्य लौट गए।
ययाति ने देवयानी को महल में स्थापित किया और शर्मिष्ठा के लिए अलग भवन बनवाया। समय आने पर देवयानी ने पुत्र को जन्म दिया।
इधर शर्मिष्ठा भी अपने यौवन के कारण चिंतित हुई और उसने ययाति से संतान की इच्छा प्रकट की। उसने धर्म और तर्क देकर ययाति को समझाया और अंततः ययाति ने उसे स्वीकार किया।
समय आने पर शर्मिष्ठा ने भी एक पुत्र को जन्म दिया।
जब देवयानी को यह ज्ञात हुआ तो वह क्रोधित हो गई। उसने शर्मिष्ठा से प्रश्न किया। शर्मिष्ठा ने उत्तर दिया कि एक ऋषि से उसे यह पुत्र प्राप्त हुआ है।
देवयानी ने इसे सत्य मान लिया।
ययाति को देवयानी से दो पुत्र हुए — यदु और तुर्वसु। शर्मिष्ठा से द्रुह्यु, अनु और पुरु उत्पन्न हुए।
एक दिन देवयानी ने तीन सुन्दर बालकों को देखा और उनसे पूछा कि उनके पिता कौन हैं। उन्होंने ययाति की ओर संकेत किया।
यह देखकर देवयानी को सत्य ज्ञात हुआ और वह क्रोधित होकर अपने पिता के पास चली गई।
उसने शुक्राचार्य से कहा — “राजा ने धर्म का उल्लंघन किया है।”
शुक्राचार्य ने क्रोधित होकर ययाति को श्राप दिया — “तुम तुरंत वृद्ध हो जाओगे।”
(आगे भाग 3 में…)

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