प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष
शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर
अध्याय 6– मायावी शक्ति और शिवा की सहचरी
भूमिगत नगर “जीवन रक्षा” में युद्ध की तैयारी चल रही थी। दैत्यराज निशाचर के साथ आर्य का युद्ध शुरू हो चुका था और पूरी मानव सभ्यता की दृष्टि उसी युद्ध पर टिकी हुई थी।
शिवा नियंत्रण कक्ष में खड़ा पृथ्वी की सतह का दृश्य देख रहा था। उसकी आँखों में चिंता थी, परंतु उसके चेहरे पर दृढ़ता भी थी।
उसी समय कक्ष का द्वार धीरे से खुला।
अंदर प्रवेश करने वाली स्त्री को देखते ही वहाँ उपस्थित सैनिक सम्मान से खड़े हो गए।
वह थी — माया।
माया केवल एक साधारण स्त्री नहीं थी। वह शिवा की सबसे विश्वसनीय सहयोगी, एक महान वैज्ञानिक और युद्धनीति विशेषज्ञ थी। भूमिगत सभ्यता के निर्माण में उसका योगदान शिवा के बराबर माना जाता था।
उसकी आँखों में अद्भुत तेज था और उसके व्यक्तित्व में ऐसी शक्ति थी कि कई सेनापति भी उसके सामने सिर झुका देते थे।
माया ने स्क्रीन की ओर देखा जहाँ आर्य और निशाचर का युद्ध चल रहा था।
उसने शांत स्वर में कहा—
“स्थिति गंभीर होती जा रही है।”
शिवा ने गहरी साँस ली।
“मुझे पता है।”
माया ने कुछ क्षण उन्हें देखा।
“आपने आर्य को अकेले भेज दिया… क्या आपको उस पर पूरा विश्वास है?”
शिवा ने उत्तर दिया—
“वह मानवता का भविष्य है।”
माया हल्की मुस्कान के साथ बोली—
“और भविष्य को बचाने के लिए कभी-कभी वर्तमान को भी युद्ध में उतरना पड़ता है।”
शिवा ने उसकी ओर देखा।
“तुम क्या कहना चाहती हो?”
माया की आँखों में अचानक एक रहस्यमय चमक आ गई।
“मैं सतह पर जाना चाहती हूँ।”
कमरे में उपस्थित सभी लोग चौंक गए।
एक सेनापति तुरंत बोला—
“यह असंभव है! सतह पर विकिरण अभी भी खतरनाक है।”
माया मुस्कुराई।
“मैं कोई साधारण वैज्ञानिक नहीं हूँ।”
फिर उसने अपने हाथ में पहनी हुई एक छोटी धातु की अंगूठी को सक्रिय किया।
अचानक उसके शरीर के चारों ओर एक हल्का ऊर्जा कवच दिखाई देने लगा।
आचार्य वेदांत आश्चर्य से बोले—
“यह…!”
माया ने कहा—
“यह बायो-एनर्जी शील्ड है। मैंने इसे कई वर्षों से विकसित किया है। यह मुझे विकिरण और विषैले वातावरण से बचा सकता है।”
शिवा कुछ देर तक मौन रहे।
फिर उन्होंने पूछा—
“और तुम सतह पर जाकर क्या करोगी?”
माया ने स्क्रीन पर युद्ध देख रहे आर्य की ओर संकेत किया।
“उसे अकेले नहीं लड़ना चाहिए।”
माया का रहस्य
लेकिन माया का उद्देश्य केवल आर्य की सहायता करना नहीं था।
उसके मन में एक और रहस्य छिपा हुआ था।
वह जानती थी कि दैत्यराज निशाचर केवल बल से नहीं हराया जा सकता।
निशाचर के पास एक ऐसी शक्ति थी जो बहुत कम लोगों को पता थी।
वह था — मानव मन को नियंत्रित करने की क्षमता।
इसी शक्ति के कारण उसने कई आदमखोर समूहों को एकजुट कर लिया था।
माया ने कई वर्षों तक इस रहस्य का अध्ययन किया था।
और उसने उसके विरुद्ध एक हथियार भी तैयार किया था।
लेकिन वह हथियार केवल उसी के पास था।
सांसारिक माया-जाल
भूमिगत नगर में भी सब कुछ उतना सरल नहीं था जितना बाहर से दिखाई देता था।
शिवा के कई पुत्र अलग-अलग बंकरों के शासक बन चुके थे।
उनमें से कुछ के मन में सत्ता की लालसा भी जन्म लेने लगी थी।
वे सोचने लगे थे कि यदि शिवा कमजोर पड़ गया तो पूरा भूमिगत साम्राज्य उनका हो सकता है।
इसी कारण नगर के भीतर भी राजनीतिक षड्यंत्र शुरू हो चुके थे।
माया इन सब बातों को जानती थी।
इसलिए उसने शिवा से कहा—
“सतह पर युद्ध जितना खतरनाक है… उससे कम खतरनाक यह शहर भी नहीं है।”
शिवा ने गंभीर स्वर में पूछा—
“तुम्हारा क्या मतलब है?”
माया ने उत्तर दिया—
“माया केवल बाहर नहीं होती… मनुष्यों के भीतर भी होती है।”
नया अभियान
कुछ ही समय बाद एक विशेष सुरंग का द्वार खोला गया।
माया युद्ध पोशाक में तैयार खड़ी थी।
उसके कंधों पर ऊर्जा हथियार था और उसके शरीर के चारों ओर हल्का नीला कवच चमक रहा था।
शिवा उसके सामने आए।
कुछ क्षण दोनों मौन रहे।
फिर शिवा ने कहा—
“सावधान रहना।”
माया मुस्कुराई।
“आप भी।”
फिर वह सुरंग के मार्ग से पृथ्वी की सतह की ओर बढ़ गई।
उधर सतह पर आर्य और निशाचर का युद्ध और भी भयानक होता जा रहा था।
और अब उस युद्ध में प्रवेश करने वाली थी—
माया।
वह स्त्री जो केवल शिवा की सहयोगी नहीं थी…
बल्कि आने वाले समय में मानवता की सबसे रहस्यमय शक्ति बनने वाली थी।
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