प्रलय युग : मानव अस्तित्व का अंतिम संघर्ष
शिवा बनाम दैत्यराज निशाचर
अध्याय – 1. नया भय
दैत्यराज निशाचर की गुफा पृथ्वी की सतह पर एक जले हुए पर्वत के भीतर स्थित थी। उस पर्वत के चारों ओर जले हुए जंगल, टूटे हुए शहरों के खंडहर और विकिरण से काली पड़ चुकी धरती फैली हुई थी। कभी यह स्थान एक महान नगर हुआ करता था, जहाँ हजारों मनुष्य रहते थे, पर अब वहाँ केवल मृत्यु की गंध और भय का साम्राज्य था।
उस दिन आकाश पर घने काले बादल छाए हुए थे। अचानक दूर आकाश में एक विशाल छाया दिखाई दी। वह कोई साधारण पक्षी नहीं था। उसके पंख इतने विशाल थे कि जब वह उड़ता तो नीचे की धरती पर अंधेरा छा जाता।
वह था राज गिद्ध।
दैत्यराज निशाचर अपने पत्थर के सिंहासन पर बैठा हुआ था। उसका विशाल शरीर रक्त से लथपथ था। उसके चारों ओर उसके अनुयायी खड़े थे, जिनकी आँखों में भूख और क्रूरता जल रही थी।
तभी एक दैत्य दौड़ता हुआ आया।
“महाराज! वह आ गया… आकाश का दानव…!”
निशाचर मुस्कुराया।
“उसे आने दो… आज से वह हमारा होगा।”
कुछ ही क्षणों में राज गिद्ध पर्वत के ऊपर आकर मंडराने लगा। उसकी आँखें आग की तरह चमक रही थीं। नीचे हजारों दैत्य खड़े थे।
निशाचर ने अपने सैनिकों को आदेश दिया।
“मांस लाओ।”
कुछ ही देर में पहाड़ जैसा मांस का ढेर लाकर उसके सामने डाल दिया गया। राज गिद्ध धीरे-धीरे नीचे उतरा। उसने अपनी विशाल चोंच से मांस को फाड़ना शुरू किया।
दैत्यराज ने अपने मन में सोचा—
“भूख सबसे बड़ी गुलामी है।”
और वही हुआ जिसकी उसे आशा थी।
राज गिद्ध उस भोजन का आदी हो गया।
धीरे-धीरे वह हर दिन उसी स्थान पर आने लगा।
अब वह दैत्यराज का अघोषित दास बन चुका था।
भूमिगत संसार
उधर पृथ्वी के बहुत नीचे, कई किलोमीटर गहराई में, मानवों का विशाल बंकर नगर जीवित था।
उस नगर का नाम था —
जीवन रक्षा।
यह कोई साधारण बंकर नहीं था। यह पृथ्वी के नीचे फैला हुआ एक विशाल शहर था जिसमें सुरंगों का जाल था।
वहाँ खेत थे जहाँ कृत्रिम सूर्य की रोशनी में पौधे उगाए जाते थे।
वहाँ प्रयोगशालाएँ थीं जहाँ वैज्ञानिक नए हथियार और औषधियाँ बना रहे थे।
वहाँ विद्यालय थे जहाँ बच्चों को यह सिखाया जाता था कि वे एक दिन पृथ्वी को वापस जीतेंगे।
इस भूमिगत नगर के केंद्र में एक विशाल कक्ष था जहाँ मानवों का शासक बैठता था।
वह था—
शिवा।
शिवा की आँखों में थकान थी, पर उनमें आग भी थी।
वह एक विशाल नक्शे को देख रहा था जिसमें पृथ्वी के नीचे बने सभी बंकरों का विवरण था।
तभी एक सैनिक दौड़ता हुआ आया।
“महाराज…”
शिवा ने सिर उठाया।
“क्या समाचार है?”
सैनिक कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“राज गिद्ध… अब हमारे नियंत्रण में नहीं रहा।”
शिवा की आँखों में एक पल के लिए गहरा अंधकार उतर आया।
“क्या हुआ?”
“दैत्यराज निशाचर ने उसे अपने पक्ष में कर लिया है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
वैज्ञानिकों में से एक बोला—
“यदि यह सत्य है… तो अब हमारी सारी बंकर श्रृंखला खतरे में है। वह पक्षी आकाश से हमारे गुप्त द्वार खोज सकता है।”
शिवा कुछ देर तक मौन रहा।
फिर उसने धीरे से कहा—
“तो अब समय आ गया है।”
वैज्ञानिक ने पूछा—
“किसका समय?”
शिवा ने उत्तर दिया—
“दूसरी योजना का।”
गुप्त योजना
शिवा ने अपने सबसे विश्वसनीय वैज्ञानिकों और सेनापतियों को एक गुप्त कक्ष में बुलाया।
वहाँ एक विशाल पारदर्शी कक्ष रखा हुआ था जिसमें कोई वस्तु ढकी हुई थी।
शिवा ने कहा—
“जब हमने राज गिद्ध बनाया था, तब हमने एक और प्रयोग शुरू किया था।”
वैज्ञानिकों ने आश्चर्य से पूछा—
“कौन सा प्रयोग?”
शिवा ने उस कक्ष की ओर संकेत किया।
धीरे-धीरे पर्दा हटाया गया।
उसके अंदर एक मानव जैसा प्राणी सो रहा था।
लेकिन वह साधारण मनुष्य नहीं था।
उसका शरीर असाधारण रूप से शक्तिशाली था।
उसकी नसों में मानव और विकिरण प्रतिरोधी जीन का मिश्रण था।
एक वैज्ञानिक ने फुसफुसाकर कहा—
“यह…?”
शिवा बोला—
“यह है नव मानव।”
“ऐसे योद्धा जो पृथ्वी की सतह पर बिना भय के रह सकेंगे।”
कमरे में उपस्थित सभी लोग स्तब्ध थे।
शिवा ने आगे कहा—
“यदि मानवता को बचाना है… तो हमें बदलना होगा।”
“अब युद्ध केवल अस्तित्व का नहीं… बल्कि विकास का है।”
आकाश का शिकारी
उसी समय पृथ्वी की सतह पर राज गिद्ध आकाश में उड़ रहा था।
उसकी आँखें अब अलग तरह से चमक रही थीं।
वह दूर क्षितिज की ओर देख रहा था।
अचानक उसने धरती के नीचे से आती हुई हल्की कंपन को महसूस किया।
उसने अपने विशाल पंख फैलाए।
और नीचे की धरती पर उतरने लगा।
उसे शायद पहली बार बंकरों का संकेत मिला था।
और इसी के साथ मानव सभ्यता का भविष्य एक नए मोड़ पर पहुँच गया।
अब यह युद्ध केवल मनुष्यों और दैत्यों के बीच नहीं था।
यह युद्ध था —
दो अलग-अलग भविष्य के बीच।
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