द! द! द! – दान, दम और दया की उपनिषद कथा
(बृहदारण्यक उपनिषद 5.2 पर आधारित आध्यात्मिक कथा)
प्राचीन काल में प्रजापति के साथ उनके तीनों वंशज — देव (देवता), मनुष्य और असुर (अहंकारी शक्ति) — साधु की तरह रहते थे और अपने जीवन के अंतिम चरण पर ज्ञान को प्राप्त करना चाहते थे। एक दिन देवताओं ने प्रजापति से कहा:
“हमें शिक्षा प्रदान करें, महोदय!”
प्रजापति ने उन्हें एक ही अक्षर बोला — “द” — और पूछा:
“क्या तुम समझ गये?”
देवताओं ने उत्तर दिया कि वे समझ गए — “इसका अर्थ है आत्म-नियंत्रण (दमयत)।” प्रजापति ने सहमति दी।
फिर मनुष्य प्रजापति के पास आया और कहा —
“हमें शिक्षा प्रदान करें, महोदय!”
प्रजापति ने फिर वही अक्षर “द” कहा और पूछने पर मनुष्यों ने कहा — “इसके अर्थ में दानशील बनो है।” प्रजापति ने फिर कहा कि वे सही समझे।
अंत में असुरों की बारी आई। वे भी शिक्षा माँगने लगे —
“हमें शिक्षा प्रदान करें, महोदय!”
अब भी वही अक्षर “द” कहा गया। असुरों ने कहा — “इसका अर्थ है दयालु बनो (दयध्वम्)।” प्रजापति ने सहमति दी कि वे भी समझ गये।
कथा का आध्यात्मिक संदेश
- देवताओं के लिए शिक्षा: **आत्म-नियंत्रण** — मन, इन्द्रियाँ और इच्छाओं पर नियंत्रण। 1
- मनुष्यों के लिए शिक्षा: **दानशीलता** — अपने पास जो धन, ज्ञान या वस्तु हो, उसे बुद्धिमानी से साझा करना। 2
- असुरों के लिए शिक्षा: **दयालुता** — कठिन परिस्थितियों में भी करुणा, सम्मान और सहानुभूति दिखाना। 3
- ये तीन गुण — **दम, दान, दया** — जीवन की आधारभूत आध्यात्मिक साधनाएँ हैं जिन्हें हर व्यक्ति सीखकर अपनाना चाहिए। 4
कहा जाता है कि जब भी आकाश में गर्जन (तड़ित) होती है तब भी वह “द! द! द!” की आवाज़ की तरह प्रतीत होती है — जो हमें यह स्मरण कराती है कि **आत्म-नियंत्रण, दान और करुणा ही हमारे जीवन की सच्ची साधना हैं**। 5
उपनिषद का सार:
सत्य और आदर्श जीवन के लिए तीन मूल अनुशासन हैं —
आत्म-नियंत्रण (दम), दान (दान) और दया (दयध्वम्).
इन तीन गुणों से ही जीवन सृष्टि के अनुरूप चलता है।

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