उद्दालक तथा याज्ञवल्क्य – आत्मा एवं ब्रह्म का गहन संवाद
(बृहदारण्यक उपनिषद 3:7 पर आधारित आध्यात्मिक कथा)
प्राचीन काल के महान आश्रमों में ब्राह्मण और शिष्यों की एक सभा इकट्ठी थी जिसमें राजा जनक ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया। वहाँ विद्वानों और ब्रह्मज्ञानी पुरोहितों की भीड़ थी।
राजा जनक ने घोषणा की:
“जो सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी होगा, उसे पुरस्कार स्वरूप सहस्र गौएं भेंट की जाएँगी।”
सभा में सन्नाटा छा गया। हर विद्वान सोचने लगा कि वह ब्रह्म को जानता है और वह श्रेष्ठता का दावा करेगा। परन्तु कोई बोलने को तैयार नहीं हुआ। तभी ऋषि याज्ञवल्क्य उठे और गंभीर स्वर में बोले:
“मुझे इन गौओं को अपने आश्रम की ओर ले जाना चाहिए।”
सभागार में उपस्थित विद्वान चकित हो गए और बोले —
“याज्ञवल्क्य! क्या आप विश्व के श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी हैं?”
तभी ऋषि उद्दालक आगे आए और प्रश्न किया:
“याज्ञवल्क्य! जब तुम कहते हो कि तुम ब्रह्म को जानते हो, तो बताओ— क्या तुम उस सूत्र को जानते हो जिसमें यह जीवन, अगला जीवन और सभी सत्ता एक साथ पिरोई हुई हैं?”
याज्ञवल्क्य ने शांत स्वर में उत्तर दिया —
“हाँ, मैं उस सूत्र को जानता हूँ। परन्तु सबसे पहले मुझे यह बताओ कि तुम उसी सूत्र को जानते हो या नहीं।”
तब उद्दालक बोले —
“मैंने सुना है कि वह सूत्र प्राण के मूल तत्त्व में निहित है। उसी में जीवन और मृत्यु के साथ सभी सत्ता अंतर्निहित हैं।”
याज्ञवल्क्य ने कहा —
“यदि तुम उस सूत्र को समझना चाहते हो, तो पहले आत्मा के स्वरूप को जानो— वह जो पृथ्वी में निवास करता है पर उससे अलग है; वह जो जल में है पर उससे पृथक् है; वह अग्नि, वायु, आकाश और सभी दिशाओं में व्याप्त है; और जो इन्द्रियों, मन और बुद्धि को नियंत्रित करता है— वही सर्वव्यापी अनन्त आत्मा है।”
याज्ञवल्क्य ने कहा—
“जो अनदेखा है पर ऐसा द्रष्टा है, जो अश्रुत है पर वह श्रोता है, जो अचिन्त्य है पर वह चिन्तक है, वही एकमात्र वास्तविक अस्तित्व है— वही आत्मा, वही ब्रह्म है।”
सभा में सभी मौन हो गए। कोई शब्द न था— केवल एक गंभीर, शांत अनुभूति का विस्तार था। उद्दालक के भीतर जिज्ञासा से आत्मा की उस शक्ति की अनुभूति जागी, जो असीम, अनंत और अविनाशी है।
तब याज्ञवल्क्य ने कहा—
“आत्मा के अतिरिक्त सब कुछ नष्ट हो जाता है— इन्द्रियाँ, इन्द्रिय विषय, जानकारियाँ— सब रूपान्तरण का विषय हैं, पर आत्मा स्वयं अविनाशी है।”
कथा का आध्यात्मिक संदेश
- ब्रह्म वही है जो सभी रूपों से परे है, पर सभी रूपों को संचालित करता है।
- आत्मा वह अनन्त शक्ति है जो शरीर, मन और इन्द्रियों से अलग है, पर उन्हें निर्देश देती है।
- गुरु-शिष्य संवाद ही आत्मा और ब्रह्म का वास्तविक ज्ञान प्रदान करता है।
- ज्ञान का अंतिम लक्ष्य केवल जानकारी नहीं, अनुभव और बोध है।
उपनिषद का सार:
वह आत्मा जो अज्ञान से परे है, वही ब्रह्म है—
जो अचिन्त्य, अश्रुत, अनिर्वचनीय है;
पर सभी क्रियाओं में उपस्थित है।

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