गार्गी तथा याज्ञवल्क्य – ब्रह्म का अनन्त स्वरूप
(बृहदारण्यक उपनिषद 3.8 पर आधारित आध्यात्मिक कथा)
प्राचीन भारत के महान यज्ञ के समय राजा **जनक** की सभा में सभी विद्वान एकत्र थे। वहाँ ऋषि **याज्ञवल्क्य** की बुद्धिमत्ता के उल्लेख होते थे। जनक ने ब्रह्म के गूढ़ स्वरूप को जानने के लिए **गार्गी वचक्नवी** को याज्ञवल्क्य से प्रश्न करने की अनुमति दी — क्योंकि उसका लक्ष्य सत्य की गहराई तक पहुँचना था। 2
गार्गी ने राजसभा में खड़े होकर कहा:
“हे याज्ञवल्क्य! बताइए — वह क्या है जो **स्वर्ग से ऊपर है**, और **पृथ्वी से नीचे है**, जो स्वर्ग और पृथ्वी के बीच भी व्याप्त है, जो **पूर्व में था**, **वर्तमान में है**, और **भविष्य में भी रहेगा**, और जिसे कहा जाता है कि वही सारे ब्रह्मांड का आधार है?”
याज्ञवल्क्य शांत स्वभाव से उत्तर देते हैं कि वह वह तत्व है जिसे उपनिषद “आकाश” कहते हैं — एक ऐसा तत्त्व जो इतना सूक्ष्म है कि वह प्रायः चेतना के समकक्ष माना जाता है। 3
परन्तु गार्गी अपने प्रश्न को और आगे ले जाती हैं — और पूछती हैं:
“और वह आकाश किससे ओत-प्रोत है?”
याज्ञवल्क्य ने कहा कि वह अनंत, **अविकारी** (जो परिवर्तन से परे है), और **अविनाशी** (जो नष्ट नहीं होता) “अक्षर” (अक्षर ब्रह्म) है —
जो न तो स्थूल है, न सूक्ष्म; न प्रकाश है, न अँधकार; न वायु है, न इथर; न इन्द्रियां, न मन; वह न तो आँखों से देखा जा सकता है, न कानों से सुना, न शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है। 4
उन्होंने आगे कहा कि यही वह पवित्र सत्ता है जिसमें सूर्य, चन्द्र, आकाश-पृथ्वी, ऋतुएँ और सारे जीव अपने नियत क्रम से चलते हैं।
आख़िरकार, सभा में सभी मौन रह गए। गार्गी ने स्मरण किया कि बिना इस **आश्चर्यजनक विद्या (ब्रह्म-ज्ञान)** के यज्ञ, तप, और अध्ययन व्यर्थ हो जाते हैं। केवल वही जिसे सचमुच ज्ञात हुआ है — वही महान ज्ञानी होता है। 5
कथा का आध्यात्मिक संदेश
- ब्रह्म वह अनंत सत्य है जिसका कोई रूप, गुण, आकार या सीमा नहीं है।
- वह न तो इन्द्रियों से समझा जा सकता है, न मन से परिभाषित; केवल अनुभवी चेतना से जाना जा सकता है।
- सृष्टि के सभी रूप और व्यवस्थाएँ उसी अविकारी चेतना में ओत-प्रोत हैं।
- जो इसे जान लेता है, वह ब्रह्म से एकत्व का अनुभव करता है और संसार का असली उद्देश्य समझ पाता है।
उपनिषद का सार:
जिस ब्रह्म को न देखा जा सकता है, न सुना जा सकता है, न शब्द से बताया जा सकता है, पर वही सबका आधार और सत्य का अनन्त स्रोत है —
वही वास्तविक ब्रह्म है।

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