शिव भक्त उपमन्यु की कथा
(एक भक्तिक कथा – शिव पुराण पर आधारित)
प्राचीन समय में एक तपस्वी बालक था जिसका नाम **उपमन्यु** था। वह **धौम्य ऋषि** के बड़े भाई और मुनि **व्याघ्रपाद** के पुत्र थे। बचपन से ही उपमन्यु के हृदय में **भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति** थी। 1
एक समय उपमन्यु अपने मामा के यहाँ गया। वहाँ उसने देखा कि मामा का पुत्र बिना किसी प्रयास के अच्छा-खास दूध पी रहा है, जबकि उपमन्यु को केवल थोड़ी-सी दूध मिली। वह निराश हुआ और माँ से कहा:
“माँ! मुझे भी वह माँ का गरम दूध चाहिए जो मेरे मामा के बेटे को मिलता है!”
माता ने ममतापूर्वक उसे समझाया और बताया कि वर्तमान कठिन परिस्थिति है। फिर उन्होंने अपने दुर्लभ संसाधनों से **कुछ बीजों को पीसकर पानी में घोल दिया**, ताकि उपमन्यु थोड़ा सन्तुष्ट हो सके। 2
पर उपमन्यु ने वह पी कर कहा:
“माँ! यह दूध नहीं है…”
माता ने आँखों में आँसू लिए समझाया कि उन्होंने यही दे पाया है, परन्तु उपमन्यु का हृदय **शिव की भक्ति में स्थित था**। 3
उसी भाव से उपमन्यु ने मन में संकल्प लिया कि वह **भगवान शिव की कठोर तपस्या करेगा**। उसने पंचाक्षर मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का जप शुरू किया और हिमालय के एक शिखर पर तपस्या आरम्भ कर दी, मिट्टी की शिवलिंग बनाकर ध्यान तथा भजन में लीन हो गया। 4
तपस्या और मंत्र जप करते हुए उसके शरीर पर कठिनाईयाँ आईं। कुछ मुनि उसे परेशान करते, पर उपमन्यु ने अविचल भक्ति से काम नहीं छोड़ा। उसका ध्यान “ॐ नमः शिवाय” पर ही केंद्रित रहा। 5
इसी दौरान **देवराज इन्द्र ने भगवान शिव की परीक्षा लेने का निर्णय लिया**। वह श्वेत ऐरावत हाथी पर सवार होकर उपमन्यु के पास आया और कहा:
“हे तपस्वी! तुम अपने इष्ट शिव का नाम क्यों उच्चारण करते हो?”
उपमन्यु ने उत्तर दिया कि उसके हृदय में **शिव ही परम सत्य हैं**, और वही उसके जीवन का लक्ष्य है। यह सुनकर इन्द्र ने उपमन्यु के समर्पण की परीक्षा ली, पर उपमन्यु ने दृढ़ता से कहा कि वह अपने इष्ट की भक्ति से कभी विचलित नहीं होगा। 6
तब **भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए**, अपने मूल स्वरूप में, माता पार्वती सहित। उन्होंने कहा:
“हे उपमन्यु! तेरी भक्ति और तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। अब तेरी इच्छाएँ पूरित होंगी।”
और उन्होंने उपमन्यु को **क्षीरसागर (दूधी समुद्र)**, मधु, घी, दही, अन्न, फलों के रस, तथा जीवन में कभी भोजन की कमी न होने का वरदान दिया। 7
कथा का आध्यात्मिक संदेश
- भक्ति और समर्पण ही जीवन को दिव्य प्रकाश से संपूर्ण करते हैं।
- कठिन तपस्या और ईमानदार भक्ति से भगवान स्वयं सहायता करते हैं।
- मनुष्य की इच्छा तभी पूर्ण होती है जब वह सत्य-ज्ञान और भक्ति से जुड़ा हो।
- कठिनाईयां जीवन को मजबूत बनाती हैं और भक्ति को गहरा करती हैं।
कथा का सार:
उपमन्यु की कथा हमें यह सिखाती है कि **भक्ति, तपस्या और पूर्ण आत्म-समर्पण** से ही परमात्मा से संबंध स्थापित होता है, और यही जीवन का वास्तविक लक्ष्य है।
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