प्राण-विद्या: सत्यकाम और गोश्रुति की ब्रह्मज्ञान कथा
(छान्दोग्य उपनिषद 5.2 पर आधारित आध्यात्मिक कथा)
प्राचीन काल में **गौतम आश्रम** में सत्यकाम जाबाला के शिष्यों में से एक था — **गोश्रुति**, जो ब्रह्म-ज्ञान की उच्च विद्या सीखने के लिए दिन-रात ध्यान, साधना और तप कर रहा था। उसने देखा था कि उसके गुरु सत्यकाम स्वयं ब्रह्म का अनंत अनुभव प्राप्त कर चुके हैं और उनका मुख प्राकृति से प्रकाशित हो रहा है। 2
एक दिन सत्यकाम ने गोश्रुति को बुलाकर कहा:
“जो जीवन की गति, जीवन-शक्ति और सृष्टि की रचना को समझ लेता है, वही प्राण (Life-Force) को जानता है। प्राण वही शक्ति है जो सब कुछ जीवित और गतिशील बनाती है।”
सत्यकाम ने समझाया कि शरीर, मन और इन्द्रियाँ जिनके द्वारा हम अनुभव करते हैं — सबका आधार **प्राण** है। वह न केवल श्वास है, बल्कि वह वह शक्ति है जिससे जीवन के प्रत्येक रूप और चेतना को गति मिलती है। 3
गुरु ने बताया कि जब प्राण का **भोजन और आवरण** की चर्चा होती है, तो उपनिषद में प्राण से पूछा गया — “मेरा खाद्य क्या है?” तब इन्द्रियाँ उत्तर देती हैं कि “जो कुछ भी भोजन है — वहीं तेरा खाद्य है।” इसी प्रकार जब प्राण पूछता है कि “मेरा आवरण (वस्त्र) क्या होगा?”, तो कहा जाता है — “जल।” इसलिए हम भोजन से पहले और बाद में जल पीते हैं ताकि प्राण को वस्त्र मिल जाए। 4
सत्यकाम ने कहा कि **प्राण-विद्या वही ब्रह्म-विद्या है**, क्योंकि जो शक्ति सब जीवन रूपों में व्याप्त है — वही अनंत, अविनाशी ब्रह्म का ही स्वरूप है। गोश्रुति ने यह गहन शिक्षा ग्रहण की तथा अपने ध्यान के द्वारा **स्वयं को प्राण और ब्रह्म के तत्त्व में विलीन** करते हुए दिव्य अनुभव प्राप्त किया। 5
कथा का आध्यात्मिक संदेश
- प्राण केवल श्वास नहीं, बल्कि वह जीवन-शक्ति है जो सभी रूपों में व्याप्त है।
- जो आत्मा को परे कर सभी जीवन रूपों का आधार समझ लेता है, वही ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त करता है।
- प्राण-विद्या आत्म-अनुभव की वह विद्या है जिसमें शरीर-मन से ऊपर उठकर चेतना का अनुभव होता है।
- ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य केवल अध्ययन नहीं, बल्कि प्राण-स्वरूप ब्रह्म को अनुभव करना है।
उपनिषद का सार:
जो शक्ति जीवन और चेतना को संचालित करती है —
वही ब्रह्म है।
प्राण-विद्या से ही व्यक्ति सृष्टि के मूल तत्त्व तक पहुँचा जा सकता है।
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