वरुण और भृगु – अनन्त का अन्वेषण
(छान्दोग्य उपनिषद पर प्रेरित आध्यात्मिक कथा)
प्राचीन काल में ऋषि **वरुण** अपने पुत्र **भृगु** के साथ बैठे थे। भृगु की जिज्ञासा अत्यंत तीव्र थी — वह जीवन, मन, प्राण और चेतना के वास्तविक स्वरूप को जानना चाहता था। उसने अपने पिता से कहा:
“पिता! मुझे वह ज्ञान सिखाइए जिसकी खोज से सब कुछ उत्पन्न होता है, जिससे यह संसार चलता है, और जिसे जानकर व्यक्ति की अज्ञानता समाप्त हो जाए।”
वरुण ने गंभीरता से उत्तर दिया:
“बेटा! हर वस्तु, चाहे वह **भोजन** हो, **प्राण** हो, **मन** हो, या आनंद — ये सभी एक गहन स्रोत से उत्पन्न होते हैं। तू ध्यानपूर्वक मेरे बताए मार्ग का अनुसरण कर और अनुभव से सत्य को जान।”
उन्होंने भृगु को कहा कि पहले वह ध्यान से **भोजन – खाद्य** पर विचार करे। भृगु ने ध्यान लगाया और अनुभव किया कि भोजन ही जीवन के लिए आवश्यक शक्ति है। उसने लौटकर बताया कि “भोजन अनन्त से आया और उसी में वह वास करता है।”
वरुण ने आगे कहा — “अब प्राण के विषय में अवलम्बन कर।” भृगु ने ध्यान से देखा और अनुभव किया कि प्राण ही जीवन को चालित करता है। यही शक्ति सब प्राणियों में व्याप्त है और सबका आधार है।”
फिर वरुण ने कहा — “अब **मन** पर ध्यान लगा।” भृगु ने विश्लेषण किया कि मन ही विचार, अभिव्यक्ति और निर्णय का कारण है। मन जितना गहन माना जाए, उतना ही वह अस्तित्व से जुड़ा है।”
आखिरकार, वरुण ने कहा — “अब तुम **आनंद** पर ध्यान करो।” भृगु ने ध्यान किया और पाया कि आनंद ही वह अंतिम अनुभव है जो शरीर-मन-प्राण के परे, शांत चेतना में व्याप्त है। यही वह अनन्त तत्व है जिससे सृष्टि के सब रूप पैदा होते हैं और उसी में सब लौटते हैं।”
कथा का आध्यात्मिक संदेश
- भोजन, प्राण, मन — ये सभी जीवन का आधार हैं, पर अन्तिम सत्य **आनंद** है।
- जो अनन्त है, वही जीवन की गति, अस्तित्व, चेतना और आनंद सभी का मूल है।
- वेदांत का लक्ष्य केवल जानकारी नहीं, बल्कि अनुभव-आधारित ब्रह्म-ज्ञान है।
- ज्ञान की गहराई तक पहुँचने के लिए ध्यान, आत्म-निरीक्षण और अनुभव आवश्यक हैं।
उपनिषद का सार:
जो अनन्त है — वही जीवन का स्रोत है, वही प्राण का आधार है, वही मन का केंद्र है, और वही आनंद का स्वरूप है।
यह वही ब्रह्म-तत्त्व है जिसे जानकर व्यक्ति संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।
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