राजा अजातशत्रु और दम्भी बालकी (बृहदारण्यक उपनिषद पर आधारित ब्रह्मज्ञान कथा)

राजा अजातशत्रु और दम्भी बालकी | बृहदारण्यक उपनिषद कथा

राजा अजातशत्रु और दम्भी बालकी

(बृहदारण्यक उपनिषद पर आधारित आध्यात्मिक कथा)


प्राचीन भारत में काशी के समीप एक समृद्ध राज्य था। उस राज्य का राजा था — अजातशत्रु। वह केवल शासक ही नहीं, बल्कि गहन ब्रह्मविचार में लीन एक ज्ञानी पुरुष था।

उसी समय एक प्रसिद्ध ब्राह्मण था — बालकी। वह वेदों, मंत्रों और उपनिषदों का पाठ कर चुका था, पर उसके भीतर विद्या का गर्व भी उतना ही प्रबल था।

एक दिन बालकी ने घोषणा की —

“मैं ब्रह्म को जानता हूँ। मैं सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि और आकाश के रूप में ब्रह्म का ध्यान करता हूँ।”

यह सुनकर बालकी राजा अजातशत्रु के पास पहुँचा। उसने सोचा — “राजा को अपने ज्ञान से प्रभावित करूँगा।”

राजा अजातशत्रु ने शांत स्वर में पूछा —

“हे ब्राह्मण! तुम जिस ब्रह्म को जानते हो, वह कहाँ स्थित है?”

बालकी बोला —

“मैं सूर्य में ब्रह्म का ध्यान करता हूँ।”

राजा ने उत्तर दिया —

“सूर्य प्रकाश देता है, पर प्रकाश देने वाला भी किसी और से प्रेरित होता है। तुमने प्रकाश को जाना, पर प्रकाश के मूल को नहीं।”

बालकी मौन हो गया। फिर बोला —

“मैं चन्द्रमा में ब्रह्म को देखता हूँ।”

राजा ने कहा —

“चन्द्रमा बदलता है, घटता-बढ़ता है। जो बदलता है, वह ब्रह्म नहीं हो सकता।”

बालकी ने एक-एक कर अग्नि, वायु, आकाश, दिशा, प्राण — सबका वर्णन किया। हर बार राजा अजातशत्रु शांत भाव से उसका सीमित ज्ञान तोड़ते गए।

अंततः बालकी थक गया। उसका दम्भ टूटने लगा।

उसने विनम्र स्वर में कहा —

“राजन! मैं जानता हूँ, पर लगता है कि मेरा ज्ञान अधूरा है।”

राजा अजातशत्रु उठे। उन्होंने बालकी को अपने साथ शयनकक्ष में ले जाकर एक सोए हुए पुरुष को दिखाया।

राजा बोले —

“यह पुरुष सो रहा है। बताओ — इस समय इसका ब्रह्म कहाँ है?”

बालकी निरुत्तर था।

राजा ने कहा —

“जब मन, इंद्रियाँ और प्राण विश्राम में होते हैं, तब जो चेतना शेष रहती है — वही आत्मा है, वही ब्रह्म है।”

उन्होंने आगे कहा —

“ब्रह्म सूर्य नहीं, चन्द्रमा नहीं, अग्नि नहीं — ब्रह्म वह है जिससे ये सब प्रकाशित होते हैं।”

बालकी की आँखों से आँसू बह निकले। उसने सिर झुकाकर कहा —

“आज समझा — ज्ञान का गर्व अज्ञान है, और विनम्रता ही ब्रह्मज्ञान का द्वार है।”

राजा अजातशत्रु ने उत्तर दिया —

“जो स्वयं को जानता है, वही ब्रह्म को जानता है।”


कथा का आध्यात्मिक संदेश

  • अहंकार विद्या का सबसे बड़ा शत्रु है।
  • ब्रह्म किसी रूप में सीमित नहीं होता।
  • शास्त्र ज्ञान से अधिक आवश्यक है आत्मबोध।
  • विनम्रता से ही वास्तविक ज्ञान प्रकट होता है।

उपनिषद का सार:
जो सोते समय भी जाग्रत रहता है, जो प्राण और मन के पार है — वही आत्मा है, वही ब्रह्म है।

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