इन्द्रियों में परस्पर विवाद – उपनिषद की आध्यात्मिक कथा
(छान्दोग्य उपनिषद पर आधारित कहानी)
एक समय सभी इन्द्रियाँ आपस में यह चर्चा कर रही थीं कि “हम में से कौन सबसे श्रेष्ठ है?” वाणी कहती है कि वही श्रेष्ठ है क्योंकि वह बोलती है। नेत्र कहता है कि वही श्रेष्ठ है क्योंकि वह देखता है। कर्ण कहता है कि वही श्रेष्ठ है क्योंकि वह सुनता है। मन कहता है कि वही श्रेष्ठ है क्योंकि वह सोचता है। हर इंद्रिय अपने आप को श्रेष्ठ साबित करना चाहती थी — पर कोई निर्णय नहीं हो पा रहा था। 1
तब उन्होंने सभी अपने पिता **प्रजापति** के पास जाकर पूछा — “हम सभी में कौन श्रेष्ठ है?” प्रजापति ने शांत स्वर में उत्तर दिया — “जिसके बिना शरीर विकलांग और असमर्थ प्रतीत होता है, वही वास्तव में श्रेष्ठ है।” 2
इन्द्रियाँ एक-एक कर शरीर से बाहर हो गईं और देखने लगे कि फिर क्या होता है। सबसे पहले वाणी ने कहा — “मेरे बिना क्या शेष बचता है?” अन्य इन्द्रियाँ बोलीं — “हम सब मूक रहते हुए भी जीवित रहीं।” तब वाणी फिर शरीर में प्रवेश कर गई। 3
अब नेत्र बाहर गया और पूछा — “मेरे बिना क्या बचता है?” अन्य इन्द्रियाँ बोलीं — “हम अँधेरे के समान रहते परन्तु प्राण के साथ जीवित रहे।” तब नेत्र शरीर में आया। 4
इसी प्रकार कर्ण, मन और अन्य इन्द्रियाँ एक-एक कर बाहर निकलीं और फिर लौटीं — ऐसा अनुभव करते हुए कि “हम तब भी जीवित हैं।” 5
पर जब **प्राण** अर्थात सांस अंदर चला गया और सभी इन्द्रियाँ उसके बिना बाहर बैठीं, तब वे एक-एक कर समझीं— बिना प्राण के कोई भी इन्द्रिय अर्थहीन है। 6
तब प्रजापति ने शिष्यों को समझाया — “तुम सभी श्रेष्ठता के कारण बहस करते हो, लेकिन वस्तुतः वही श्रेष्ठ है जिसकी शक्ति से सब इन्द्रियाँ और मन कार्य करते हैं — वही प्राण है। वही जीवन का आधार है।” 7
कथा का आध्यात्मिक संदेश
- इन्द्रियाँ, मन और वाणी केवल माध्यम हैं; उनमें से श्रेष्ठ वह है जो जीवन की मूल शक्ति प्रदान करता है।
- प्राण ही वह शक्ति है जिसकी प्रेरणा से सभी इन्द्रियाँ और चेतना कार्य करती है।
- विचारों और कर्मों का मूल स्रोत वही ब्रह्मीय चेतना है, जो सांस तथा जीवन-शक्ति के रूप में प्रकट होती है।
- अहंकार और प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर हमें अपने वास्तविक स्रोत को जानना चाहिए।
उपनिषद का सार:
जब इन्द्रियाँ स्वयं श्रेष्ठता का दावा करती हैं, तब यह ध्यान देना आवश्यक है कि जीवन की वास्तविक गति और चेतना केवल प्राण की शक्ति से है—
और इसी चेतना की उपस्थिति से संसार चलता है।

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