किससे प्रेरित होकर विश्व गति करता है?
(केनोपनिषद पर आधारित आध्यात्मिक कथा)
प्राचीन भारत के एक वनाश्रम में प्रातःकाल का समय था। सूर्य की किरणें साल और पीपल के वृक्षों से छनकर भूमि पर उतर रही थीं। आश्रम में शांति थी, पर शिष्यों के मन में एक गहरी जिज्ञासा उठ चुकी थी।
ऋषि निष्कम्प कुशासन पर विराजमान थे। उनके चारों ओर शिष्य मौन में बैठे थे। तभी एक शिष्य ने विनयपूर्वक प्रश्न किया—
“गुरुदेव! किसकी प्रेरणा से मन सोचता है? किसके आदेश से प्राण चलता है? किसके कारण वाणी बोलती है, आँख देखती है और कान सुनते हैं? वह कौन है जिससे यह सम्पूर्ण विश्व गति करता है?”
ऋषि ने आँखें खोलीं। उनके मुख पर करुणा और गम्भीरता का अद्भुत मेल था। उन्होंने कहा—
“वत्स! तुमने वही प्रश्न पूछा है जो केनोपनिषद का मूल है। यह प्रश्न साधारण नहीं, यह आत्मा की पुकार है।”
ऋषि ने आगे कहा—
“जिसे आँख नहीं देख सकती, पर जिसकी शक्ति से आँख देखती है; जिसे कान नहीं सुन सकते, पर जिसकी शक्ति से कान सुनते हैं; जिसे मन नहीं जान सकता, पर जिसकी प्रेरणा से मन सोचता है— वही ब्रह्म है।”
शिष्य विस्मित रह गए। एक ने पूछा—
“यदि हम उसे देख नहीं सकते, जान नहीं सकते, तो फिर उसे कैसे समझें?”
ऋषि मुस्कराए—
“ब्रह्म को जानना वस्तुओं को जानने जैसा नहीं है। जब तुम कहते हो ‘मैं जानता हूँ’, तब तुम नहीं जानते। और जब तुम कहते हो ‘मैं नहीं जानता’, तब तुम जानने के निकट होते हो।”
उन्होंने अग्निहोत्र की ओर संकेत किया। यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित की गई। मंत्रोच्चारण हुआ—
‘यस्यामतं तस्य मतं, मतं यस्य न वेद सः।’
ऋषि बोले—
“ब्रह्म इंद्रियों का विषय नहीं, वह इंद्रियों की शक्ति है। वह प्राण नहीं, पर प्राणों को चलाने वाला है। वह मन नहीं, पर मन को सोचने वाला है।”
धीरे-धीरे शिष्यों को अनुभव होने लगा कि वे जिस ‘मैं’ को जानते थे, वह सीमित था। उसके पीछे एक असीम चेतना थी— जो न दिखाई देती है, न सुनी जाती है, पर सब कुछ उसी से चलता है।
एक शिष्य की आँखों से आँसू बह निकले। उसने कहा—
“गुरुदेव! अब समझ में आया— हम नहीं चलते, हमसे चलाया जाता है।”
ऋषि ने कहा—
“हाँ वत्स। जब यह बोध जागता है, तब अहंकार टूटता है और ब्रह्मज्ञान का द्वार खुलता है।”
कथा का आध्यात्मिक संदेश
- विश्व किसी भौतिक शक्ति से नहीं, ब्रह्म से प्रेरित होकर चलता है।
- ब्रह्म इंद्रियों का विषय नहीं, उनकी शक्ति है।
- ज्ञान का अर्थ संग्रह नहीं, अहंकार का विसर्जन है।
- जब ‘मैं’ शांत होता है, तब सत्य प्रकट होता है।
उपनिषद का सार: जो मन को सोचने की शक्ति देता है, प्राण को चलाता है और इंद्रियों को सक्रिय करता है— वही ब्रह्म है। उसी से प्रेरित होकर सम्पूर्ण विश्व गति करता है।

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