प्रकाशको का प्रकाश – ज्ञान और सत्य का प्रकाश
अतीत के समय में, एक पर्वतों और नदियों के किनारे प्रकाशको आश्रम स्थित था। यह आश्रम शिष्य और साधकों के लिए ब्रह्मज्ञान और आध्यात्मिक साधना का केंद्र था। यहाँ के गुरु शिष्यों को सिखाते थे कि जीवन का उद्देश्य केवल सांसारिक सफलता नहीं, बल्कि सत्य और ज्ञान का प्रकाश फैलाना है।
एक दिन, शिष्य वीरान ने गुरु से पूछा – "गुरुजी! कैसे हम जीवन में सच्चे प्रकाश और ज्ञान तक पहुँच सकते हैं? क्या इसे केवल अध्ययन से प्राप्त किया जा सकता है?" गुरु ने उत्तर दिया – "शिष्य! ज्ञान और प्रकाश केवल पढ़ाई से नहीं मिलते। हवन, ध्यान और सत्संग से मन शुद्ध होता है, इन्द्रियाँ संयमित होती हैं, और तब आत्मा ब्रह्म का अनुभव करती है।"
वीरान ने प्रतिदिन हवन किया। कुश आसन पर बैठकर अग्नि की ज्वाला में दीप प्रज्वलित किया। मंत्रोच्चारण और ध्यान से उसने मन को शांत किया। धीरे-धीरे वीरान ने अनुभव किया कि जीवन के हर अनुभव में ब्रह्म और सत्य का प्रतिबिंब होता है। यह अनुभव उसे समझाता है कि ज्ञान का प्रकाश केवल दूसरों तक फैलाकर ही जीवन सफल होता है।
गुरु ने शिष्य को और मार्गदर्शन दिया – "अब जब तूने प्रकाश और ज्ञान का अनुभव किया है, इसे अपने जीवन और कर्मों में फैलाना। दूसरों को भी मार्ग दिखा, उनके मन में सत्य और धर्म का प्रकाश जला। यही वास्तविक जीवन का उद्देश्य है।"
वीरान ने गुरु की बात का पालन किया। उसने आश्रम के अन्य शिष्यों को ज्ञान, हवन और ध्यान का अभ्यास कराया। धीरे-धीरे पूरे आस-पास का क्षेत्र ज्ञान और शांति से उज्जवल हुआ। उसका जीवन इस सिद्धांत पर आधारित हुआ कि वास्तविक प्रकाश वही है जो दूसरों को मार्ग दिखाए।
कहानी का Moral और Lessons:
- ज्ञान और सत्य का प्रकाश जीवन को उज्जवल बनाता है।
- हवन, ध्यान और सत्संग से मन और आत्मा शुद्ध होती है।
- आत्मा और ब्रह्म का अनुभव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।
- ज्ञान का वास्तविक मूल्य तब है जब इसे दूसरों तक फैलाया जाए।

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