उशस्ति की कथा – यज्ञ और ज्ञान का प्रेरक अनुभव

उशस्ति की कथा – यज्ञ और ज्ञान का प्रेरक अनुभव

उशस्ति की कथा – यज्ञ और ज्ञान का प्रेरक अनुभव

(छान्दोग्य उपनिषद 1.10-11 पर आधारित आध्यात्मिक कथा)


प्राचीन काल में **कुरुदेश** नामक प्रदेश में एक भीषण तूफान और वर्षा के कारण सब फसलें नष्ट हो गईं थीं और famine (कुपोषण) छा गया था। उस संकट के समय उसी स्थान पर **उशस्ति** नामक ज्ञानी ऋषि निवास करते थे, जो चक्र के पुत्र थे। वे सरल, दयालु और गुणों से सम्पन्न थे। परन्तु विपदा के कारण उन्हें तथा उनके परिवार को भोजन के लिए कठिन समय का सामना करना पड़ा। 1

उशस्ति ने भोजन प्राप्त करने हेतु एक गाँव में निवास करने वाले व्यक्ति से *कुछ सेम और पानी* माँगे। उस व्यक्ति के पास सड़े सेम थे। उसने कहा कि केवल वही उपलब्ध है। उशस्ति ने कहा —

“यदि मैं सेम नहीं खाऊँ तो जीवित रहना कठिन है। पर मैं पानी सिर्फ *जूठा नहीं पीता*।”

यह सुनकर गाँव वाला बोला — “तुमने पहले सड़े सेम खा लिए पर पानी नहीं पीया।”

उशस्ति ने कहा — “सेम आवश्यक थे जीवित रहने हेतु, पर पानी जहाँ भी मिलेगा, वह ताज़ा पी लूँगा।” उसने भक्षण करके अपनी भूख थोड़ी शांत की और सम्मानपूर्वक पत्नी के लिए कुछ सेम सुरक्षित रख दिए। दूसरी सुबह, पत्नी ने पहले ही स्वयं अपने और बच्चे के लिए भोजन का प्रबन्ध कर लिया था। 2

उशस्ति ने यज्ञस्थल की ओर चलकर कहा —

“राजा यहाँ यज्ञ कर रहा है। शायद मुझे वहाँ पुरोहित का कार्य करने का अवसर प्राप्त हो।”

जब वे यज्ञ मण्डप पहुँचे तो पुरोहितजन मंत्रोच्चारण के लिए बैठे थे। पर उशस्ति ने उनसे पूछा —

“क्या आप जानते हैं कि आप जिन देवताओं का आवाहन कर रहे हैं, उनका वास्तविक ज्ञान क्या है?”

वे सभी मौन हो गए, क्योंकि वे देवताओं का वास्तविक अर्थ नहीं जानते थे। इसके पश्चात् राजा वहाँ आए और पूछा —

“तुम कौन हो?”

उशस्ति ने उत्तर दिया — “मैं उशस्ति, चक्र का पुत्र हूँ।” राजा ने सुनकर कहा — “अब यज्ञ के पुरोहित का कार्य तुम करने योग्य हो।”

उशस्ति ने आगे उन पुरोहितों को यज्ञ के देवताओं, मंत्रों और उनकी वास्तविक प्रेरणा का ज्ञान देना आरम्भ किया तथा यज्ञ को पूर्णतः सम्पन्न किया। सभी पुरोहितजन और राजा आश्चर्यचकित रह गए। 3


कथा का आध्यात्मिक संदेश

  • सत्यता और नैतिकता कठिन समय में भी आत्म-विश्वास प्रदान करती हैं।
  • सत्कर्म और विवेकशील निर्णय ही प्रतिष्ठा और सम्मान दिलाते हैं।
  • ज्ञान केवल शब्दों से नहीं, अनुभव और आत्म-निरीक्षण से प्राप्त होता है।
  • जिस व्यक्ति में गुण, ज्ञान और धैर्य होता है, वह यज्ञ (कार्य) का सफल पुरोहित बन सकता है।

उपनिषद का सार:
संकट और कठिन परिस्थितियाँ भी उस साधक को विजयी बनाती हैं जो सत्य, धर्म और ज्ञान के मार्ग पर दृढ़ता से चलता है।

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