उपकोसल की कथा – ब्रह्म का अनुभव (Chandogya Upanishad 4.10)

उपकोसल की कथा – ब्रह्म का अनुभव | Chandogya Upanishad Story

उपकोसल की कथा – ब्रह्म का अनुभव

(छान्दोग्य उपनिषद 4.10 पर आधारित आध्यात्मिक कथा)


उपकोसल कमला का पुत्र था। वह **सत्यकाम जाबाला** ऋषि के आश्रम में **बारह वर्षों तक ब्रह्मचारी के रूप में साधना और अध्ययन** करता रहा, और स्वयं अग्नि-यज्ञ की सेवा पूर्ण निष्ठा से करता रहा। जब शिष्यों को गृह लौटने की अनुमति दी गई, तो केवल उपकोसल को घर जाने **अनुमति नहीं दी गई**। वह चकित और व्यथित हो गया कि उसके भीतर अब भी वह ज्ञान क्यों प्राप्त नहीं हुआ जिसके लिए उसने वर्षो तपस्या की। 2

उपकोसल कीGuru की पत्नी ने बड़े प्रेम से उसे समझाने की कोशिश की, पर वह दुख के कारण भोजन भी नहीं कर पा रहा था। उसने कहा कि उसके मन में अनेक इच्छाएँ हैं जो उसे विचलित करती हैं और वह उन सभी से मुक्त होना चाहता है। 3

एकाग्र विचार और शुद्धता की चाह में वह सूक्ष्म ध्यान में लीन हो गया। तभी उसके कानों को अग्नि से एक दिव्य वाणी सुनाई दी—

“यह जीवन ब्रह्म है, यह आकाश ब्रह्म है, यह परमानन्द ब्रह्म है। तुम स्वयं को ब्रह्म जानो।”

उपकोसल ने कहा कि वह जानता है कि जीवन ब्रह्म है, पर समझना चाहता है कि आकाश और आनन्द भी ब्रह्म कैसे हैं। उसे पुनः अग्नि से वाणी मिली कि ब्रह्म का निवास हृदय के कमल में है और जब उसकी आत्मा की गहराई में प्रवेश होगा, तब सब सत्य प्रकट होगा। 4

अग्नि ने आगे कहा कि वह पृथ्वी, जीवन, सूर्य, चन्द्र, तारे, बिजली तथा जल सभी ब्रह्म के ही रूप हैं। जो कुछ जगत में दिखाई देता है, वह ब्रह्म का ही प्रगटन है। उपकोसल ने सारा विश्व उसी दिव्य प्रकाश के रूप में देखा और अनुभव किया। 5

कुछ समय बाद सत्यकाम जाबाला स्वयं लौट कर आया और उसने उपकोसल को दिव्य दीप्ति लिए देखा। उसने कहा कि उपकोसल के मुख पर **ब्रह्मज्ञानी की चमक** है और जो ज्ञान उसे प्राप्त हुआ है वह सत्य है। सत्यकाम ने उपकोसल को और भी गहन ब्रह्मज्ञान दिया और अन्ततः उसे गृह लौटने की अनुमति दे दी। 6


कथा का आध्यात्मिक संदेश

  • ज्ञान केवल शास्त्र-पठन से नहीं, बल्कि ध्यान, सेवा और अनुभव से प्राप्त होता है।
  • जो आत्मा की गहराई में जागरित होता है, वही ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।
  • विश्व का प्रत्येक रूप, चाहे वह जीवन हो या प्रकृति, ब्रह्म के ही रूपों का प्रगटन है।
  • जब कोई स्वयं को ब्रह्म रूप समझ लेता है, तब वह किसी भी आघात से प्रभावित नहीं होता।

उपनिषद का सार:
जो वह तत्व है कि जिसमें प्राण, अग्नि, जीवन, सूर्य, चन्द्र तथा जगत का समस्त रूप निहित है— वही स्थिर, अविनाशी और परम ब्रह्म है; और वही आत्मा भी है।

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