📜 वसिष्ठ की कथा — हिन्दी अनुवाद (Part 4 – Final)
एक समय ऐसा आया जब , जो पहले शाप से पीड़ित हो चुका था, अपनी पत्नी के साथ वन में चला गया। शाप के प्रभाव में वह इधर-उधर भटकता रहा।
एक दिन वह घने वन में अत्यंत भूख से व्याकुल होकर भोजन की खोज कर रहा था। उसी समय उसने एक एकांत स्थान पर एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी को देखा, जो आपस में प्रेम में लीन थे।
राजा को देखकर वे भयभीत होकर भागने लगे, परंतु राजा ने उस ब्राह्मण को पकड़ लिया।
परंतु शाप के प्रभाव में अंधा हुआ राजा उसकी बात न मानकर उस ब्राह्मण को उसी के सामने खा गया।
यह भयंकर दृश्य देखकर ब्राह्मणी क्रोध और शोक से भर उठी। उसके आँसू अग्नि के समान जलने लगे। उसने राजा को श्राप दिया—
“हे दुष्ट! तूने मेरे प्रिय पति को मेरी आँखों के सामने खा लिया। इसलिए जब भी तू अपनी पत्नी के पास जाएगा, उसी क्षण तेरी मृत्यु हो जाएगी! और तेरी पत्नी तेरे वंश को आगे बढ़ाने के लिए किसी अन्य पुरुष—ऋषि —से पुत्र उत्पन्न करेगी!”
यह श्राप देकर वह ब्राह्मणी अग्नि में प्रवेश कर गई।
श्राप का प्रभाव और पश्चाताप
कुछ समय बाद जब राजा शाप से मुक्त हुआ और अपनी पत्नी के पास गया, तब रानी ने उसे रोक दिया।
राजा को उस ब्राह्मणी का श्राप याद आ गया और वह भयभीत हो गया। उसे अपने कर्मों पर गहरा पश्चाताप हुआ।
इसी कारण उसने वसिष्ठ से निवेदन किया कि वे उसकी रानी से संतान उत्पन्न करें।
पराशर का जन्म और वंश की रक्षा
इसी बीच , जो वसिष्ठ के आश्रम में रह रही थी, उसने एक पुत्र को जन्म दिया। यह बालक का पुत्र था और अपने पिता के समान तेजस्वी था।
वसिष्ठ ने उसके सभी संस्कार किए। चूँकि वसिष्ठ ने उसके जन्म के कारण आत्महत्या का विचार त्याग दिया था, इसलिए उसका नाम रखा गया — (अर्थात् जो मृत को पुनर्जीवित करे)।
पराशर बचपन से ही वसिष्ठ को अपना पिता मानते थे।
एक दिन उन्होंने वसिष्ठ को “पिता” कहकर पुकारा। यह सुनकर उनकी माता अदृश्यन्ती रो पड़ी और बोली—
“हे पुत्र! ये तुम्हारे पिता नहीं, बल्कि तुम्हारे पितामह हैं। तुम्हारे पिता को एक राक्षस ने खा लिया था।”
यह सुनकर पराशर अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने संकल्प किया कि वे सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश कर देंगे।
विनाश का संकल्प और रोकना
जब को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने पराशर को समझाया—
“हे पुत्र! सृष्टि का विनाश करना उचित नहीं है। संयम और शांति ही श्रेष्ठ हैं।”
पराशर शांत तो हो गए, परंतु उन्होंने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए एक भयानक यज्ञ आरंभ किया।
राक्षस यज्ञ और उसका अंत
इस यज्ञ में पराशर राक्षसों को अग्नि में डालकर भस्म करने लगे। उनका तेज अग्नि के समान प्रज्वलित था।
यह देखकर महान ऋषि—वहाँ आए।
पुलस्त्य ने पराशर से कहा—
“हे बालक! निर्दोष राक्षसों का वध उचित नहीं है। तुम्हारे पिता की मृत्यु उनके अपने कर्मों का परिणाम थी। कोई राक्षस उन्हें मारने में समर्थ नहीं था।”
“तुम केवल एक साधन बन रहे हो। इसलिए इस यज्ञ को रोक दो।”
वसिष्ठ ने भी यही समझाया।
यज्ञ का समापन और अंतिम संदेश
यह सुनकर पराशर ने यज्ञ रोक दिया।
उन्होंने उस अग्नि को हिमालय के उत्तर के वनों में स्थापित कर दिया, जहाँ वह आज भी राक्षसों और वनस्पतियों को जलाती रहती है।
🔱 कथा का गूढ़ निष्कर्ष
यह महान कथा हमें सिखाती है—

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