देवयानी और शर्मिष्ठा की कथा (महाभारत) – Part 4 (Final)
वृषपर्वा के आदेश को सुनकर दासी तुरंत शर्मिष्ठा के पास गई और उसे सारी बात बताई— “हे राजकुमारी! देवयानी ने आदेश दिया है कि आप अपनी एक हजार दासियों सहित उसकी सेवा में रहें। यदि आप ऐसा नहीं करेंगी, तो महर्षि शुक्राचार्य असुरों को छोड़कर चले जाएंगे, और इससे समस्त असुरों का विनाश हो जाएगा।”
यह सुनकर शर्मिष्ठा ने बिना किसी विरोध के उत्तर दिया— “यदि मेरे कारण मेरे कुल और समस्त असुरों को संकट में पड़ना पड़े, तो यह उचित नहीं होगा। मैं प्रसन्नता से देवयानी की आज्ञा का पालन करूँगी।”
इसके बाद शर्मिष्ठा एक हजार दासियों के साथ पालकी में बैठकर अपने पिता के महल से निकलकर देवयानी के पास पहुँची।
देवयानी के सामने पहुँचकर उसने विनम्रता से कहा— “हे देवयानी! मैं अपनी एक हजार दासियों सहित आपकी सेवा में उपस्थित हूँ। अब से मैं आपकी दासी हूँ और जहाँ भी आपके पिता आपको विवाह में देंगे, मैं आपके साथ चलूँगी।”
देवयानी ने थोड़े व्यंग्य और स्मरण के साथ उत्तर दिया— “मैं तो उस व्यक्ति की पुत्री हूँ जो तुम्हारे पिता की स्तुति करता है और भिक्षा स्वीकार करता है। और तुम उस राजा की पुत्री हो जो दान देता है और सबका स्वामी है। ऐसी स्थिति में तुम मेरी दासी कैसे बन सकती हो?”
शर्मिष्ठा ने अत्यंत धैर्य और विनम्रता से उत्तर दिया— “परिवार और कुल की भलाई के लिए व्यक्ति को अपना अहंकार त्यागना पड़ता है। मैं अपने कुल के हित के लिए आपकी सेवा करूँगी और जहाँ भी आप जाएँगी, मैं आपके साथ रहूँगी।”
शर्मिष्ठा के इस उत्तर से देवयानी संतुष्ट हो गई।
तब उसने अपने पिता शुक्राचार्य से कहा— “हे महान ब्राह्मण! अब मैं प्रसन्न हूँ। मैं अब असुरों के नगर में वापस जाने के लिए तैयार हूँ। अब मुझे यह भी विश्वास हो गया है कि आपकी शक्ति और विद्या व्यर्थ नहीं है।”
यह सुनकर महान तपस्वी शुक्राचार्य अत्यंत प्रसन्न हुए और अपनी पुत्री के साथ पुनः असुरराज वृषपर्वा के नगर में लौट आए।
असुरों ने उनका अत्यंत आदर और सम्मान के साथ स्वागत किया। वे सभी इस बात से अत्यंत प्रसन्न थे कि उनके गुरु पुनः उनके बीच लौट आए हैं।
इस प्रकार देवयानी और शर्मिष्ठा की यह कथा हमें यह सिखाती है कि— अहंकार का त्याग, धैर्य, और परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है।
जहाँ एक ओर देवयानी का आत्मसम्मान और दृढ़ता दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर शर्मिष्ठा का त्याग और कर्तव्यभाव भी उतना ही महान है।
इसी संतुलन में जीवन का वास्तविक धर्म छिपा हुआ है।

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