🌊 कथासरित्सागर – भाग II
(वररुचि, पुष्पदंत और उनके गुरुओं की कथा)
🌿 पुष्पदंत का विन्ध्य की ओर प्रवास
पुष्पदंत, जो पृथ्वी पर मानव रूप में भ्रमण कर रहे थे, वररुचि और कात्यायन के नाम से जाने गए।
- उन्होंने विभिन्न विद्या-शास्त्रों में पूर्णता प्राप्त की।
- राजा नंद के दरबार में मंत्री के रूप में सेवा की।
- थकान के कारण वे एक बार दुर्गा मंदिर दर्शन के लिए गए।
दुर्गा माता, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर, स्वप्न में आदेश देती हैं:
"जाओ, विन्ध्य के जंगलों में कनभूति को देखो।"
- वे पानी रहित, जंगली और बाघों और बंदरों से भरे जंगल में पहुंचे।
- वहां उन्होंने एक विशाल न्याग्रोधा वृक्ष देखा।
- उसके पास कनभूति नामक पिशाच दिखाई दिया, जो शाला वृक्ष के समान विशाल था।
🙏 कनभूति और पुष्पदंत की भेंट
कनभूति ने पुष्पदंत को देखा और आदरपूर्वक उनके चरण स्पर्श किए।
- कात्यायन ने तुरंत उनसे पूछा:
"तुम अच्छे रीति-रिवाजों के पालन करने वाले हो, फिर तुम इस अवस्था में कैसे आए?"
कनभूति ने उत्तर दिया:
"मैं स्वयं नहीं जानता, परंतु सुनो जो मैंने शिव से उज्जयिनी में शवदाह स्थल पर सुना।"
शिव ने दुर्गा माता से कहा था:
"मुझे खोपड़ी और शवदाह स्थलों में इतना आनंद क्यों आता है?"
शिव का उत्तर था:
- जब काल्प की समाप्ति पर सारा जगत जल गया, तब ब्रह्मांड जल में परिवर्तित हो गया।
- शिव ने अपनी जांघ को भेदकर रक्त की एक बूंद गिराई।
- वह बूंद जल में गिरकर अंडा बन गई।
- उस अंडे से सर्वोच्च आत्मा (परमात्मा) उत्पन्न हुई।
- उसके द्वारा प्रकृति बनाई गई, और उसने अन्य देवताओं और प्राणियों की सृष्टि की।
- जब उस आत्मा ने अहंकार किया, शिव ने उसका मस्तक काट दिया।
- इसलिए अब शिव खोपड़ी धारण करते हैं और शवदाह स्थलों को प्रिय मानते हैं।
शिव का संदेश:
“जगत स्वयं भी खोपड़ी सदृश है; स्वर्ग और पृथ्वी, दोनों उस अंडे के खोपड़ी-जैसे अर्धों से बने हैं।”
🌟 पुष्पदंत का पुनः जन्म
- पार्वती ने शिव से पूछा:
"पुष्पदंत हमें कितने समय में लौटेंगे?"
- शिव ने उत्तर दिया:
"वह पिशाच जिसे तुम देख रहे हो, पहले कुबेर का यक्ष था, और उसके मित्र राक्षस स्थूलसिरस थे।
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धनदेव ने उसे विन्ध्य पर्वत में शापित कर दिया।
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जब वह महान कथा सुनाएगा और मल्यवान को बताएगा, तब वह शाप से मुक्त होगा।"
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कनभूति जब यह कथा सुनता है, वररुचि (पुष्पदंत) को अपनी पहचान याद आती है।
"मैं वही पुष्पदंत हूँ, मेरी कथा सुनो।"
- कात्यायन ने सात लाख छंदों में सात महान कथाएँ सुनाईं।
- कनभूति ने कहा:
"हे प्रभु, आप शिव के अवतार हो। अब मुझे अपनी संपूर्ण जीवन कथा सुनाइए।"
🏛️ वररुचि का जन्म और शिक्षा
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कौसांबी नगर में एक ब्राह्मण रहते थे – सोमदत्त (उपनाम अग्निशिखा)।
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उनकी पत्नी का नाम वसुदत्त था।
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वररुचि इसी जोड़ी के घर जन्मे, और उनके जन्म का कारण एक शाप था।
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बचपन में पिता का देहांत हुआ।
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माता ने कठिन श्रम से उनका पालन-पोषण किया।
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एक दिन दो ब्राह्मण आए, जो थके और धूल-भरे थे।
वररुचि ने कहा:
"मैं इसे देखूंगा और पूरे संवाद को तुम्हारे सामने प्रस्तुत करूंगा।"
- ब्राह्मण आश्चर्यचकित हुए।
- उन्होंने वररुचि को एक श्लोक (प्रतिसाख्य) सुनाकर परीक्षा ली।
- वररुचि ने एक बार सुनने पर उसे पूरी तरह याद कर लिया।
🧑🏫 गुरु वर्ष के पास प्रशिक्षण
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वररुचि, व्याडि और इन्द्रदत्त ने पाटलिपुत्र जाकर गुरु वर्ष के पास शिक्षा ली।
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सीखने की गति:
- वररुचि: एक बार सुनकर याद कर लेते थे।
- व्याडि: दो बार सुनने पर समझते थे।
- इन्द्रदत्त: तीन बार सुनने पर मास्टर स्तर की समझ प्राप्त करते थे।
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उनकी विद्या देखकर नगर के ब्राह्मण और राजा नंद प्रसन्न हुए।
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गुरु वर्ष का घर धन और सम्मान से भर गया।
आधुनिक सीख:
- सीखने की गति अलग हो सकती है, लेकिन समर्पण और लगन से सब कुछ संभव है।
- ज्ञान का सही गुरु और सही मार्गदर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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