परीक्षित और मृत्यु के सामने भक्ति

 

🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

 परीक्षित और मृत्यु के सामने भक्ति

(भागवत पुराण आधारित | मृत्यु-दर्शन | भक्ति की पराकाष्ठा |)


☠️ परीक्षित और मृत्यु के सामने भक्ति

(जहाँ भय नहीं, प्रेम अंतिम सत्य बन जाता है)

श्रृंखला: 18 पुराण कथा-श्रृंखला
पुराण: भागवत पुराण
कथा क्रम: PART-4 | कथा-2
विषय: परीक्षित, मृत्यु, शुकदेव, भक्ति
Labels: Bhagavata Purana, Parikshit, Bhakti and Death, Spiritual Courage


🕉️ भूमिका : मृत्यु का भय या अवसर?

मनुष्य मृत्यु को—

  • अंत
  • भय
  • विफलता

मानता है।

पर भागवत पुराण कहता है—

मृत्यु
सबसे बड़ा आध्यात्मिक अवसर है।

राजा परीक्षित
इसी सत्य का जीवंत उदाहरण हैं।


👑 परीक्षित कौन थे?

परीक्षित—

  • अर्जुन के पौत्र
  • अभिमन्यु के पुत्र
  • धर्मराज युधिष्ठिर के उत्तराधिकारी

वे—

  • न्यायप्रिय
  • धर्मनिष्ठ
  • वीर

फिर भी—

मृत्यु सबके द्वार पर आती है।


🐍 श्राप की कथा

एक दिन—

  • परीक्षित वन में जाते हैं
  • प्यास से व्याकुल होते हैं
  • ऋषि शमीक के आश्रम पहुँचते हैं

ऋषि मौन-व्रत में होते हैं।

क्रोधवश
परीक्षित उनके गले में
मृत सर्प डाल देते हैं।

ऋषि-पुत्र श्रृंगी
यह देखकर श्राप देते हैं—

सातवें दिन
तक्षक सर्प
राजा को डसेगा।


🌺 पश्चाताप और जागरण

श्राप सुनते ही—

  • परीक्षित भयभीत नहीं होते
  • क्रोधित नहीं होते

बल्कि—

भीतर से जाग जाते हैं।

वे कहते हैं—

यह दंड नहीं,
ईश्वर की कृपा है।


🕊️ गंगातट पर भक्ति का आसन

परीक्षित—

  • राज्य त्याग देते हैं
  • गंगातट पर बैठ जाते हैं
  • उपवास का संकल्प लेते हैं

उनका प्रश्न केवल एक—

“मरणासन्न मनुष्य को
क्या करना चाहिए?”


📿 शुकदेव का आगमन

उसी क्षण—

  • शुकदेव प्रकट होते हैं
  • निर्विकार
  • नग्न
  • ब्रह्मज्ञानी

वे—

उपदेश नहीं,
कथा सुनाते हैं।

यहीं से
भागवत पुराण का जन्म होता है।


🪔 मृत्यु के सामने भक्ति का स्वरूप

सात दिन—

  • न भय
  • न पछतावा
  • न शोक

केवल—

कृष्ण-कथा
और प्रेम।

मृत्यु आती है—

  • तक्षक के रूप में

पर परीक्षित—

पहले ही मुक्त हो चुके होते हैं।


🧠 दार्शनिक रहस्य

भागवत कहता है—

  • मृत्यु शरीर की है
  • आत्मा की नहीं

भक्ति—

मृत्यु को भी
मोक्ष में बदल देती है।


🌼 साधक के लिए संदेश

1️⃣ मृत्यु से भागो नहीं
2️⃣ उसे गुरु बनाओ
3️⃣ भय नहीं, भक्ति चुनो
4️⃣ अंत को सुंदर बनाओ


🔚 निष्कर्ष

परीक्षित और मृत्यु के सामने भक्ति
यह सिखाता है—

जो मृत्यु को स्वीकार करता है,
वही जीवन को समझता है।

जहाँ भय समाप्त होता है,
वहीं से
भागवत आरंभ होता है।



Post a Comment

0 Comments