📜 वसिष्ठ की कथा —हिन्दी (Part 1)
प्राचीन काल में नामक नगर में एक महान और विश्वप्रसिद्ध राजा रहते थे, जिनका नाम था। वे के पुत्र थे। उस धर्मात्मा गाधि के एक पुत्र हुए, जिनका नाम था। वे शत्रुओं का संहार करने वाले, विशाल सेना, असंख्य पशुओं और रथों से सम्पन्न थे।
विश्वामित्र अपने मंत्रियों के साथ घने वनों में शिकार के लिए जाया करते थे, जहाँ वे हिरणों और जंगली सूअरों का शिकार करते थे। एक दिन शिकार करते-करते राजा अत्यधिक थक गए और उन्हें प्यास भी लग गई। उसी अवस्था में वे के आश्रम में पहुँचे।
महान ऋषि वसिष्ठ ने राजा को आते देखा और उनका आदरपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने उन्हें मुख और चरण धोने के लिए जल दिया, अर्घ्य प्रदान किया, फल, घी और अन्य पदार्थों से उनका सत्कार किया।
ऋषि वसिष्ठ के पास एक दिव्य गौ थी, जिसका नाम था। वह इच्छानुसार सब कुछ देने वाली थी। जब उससे कहा जाता—“दे”, तो वह तुरंत इच्छित वस्तु प्रदान कर देती।
वह गौ विभिन्न प्रकार के फल, अन्न (जंगली और खेतों के), दूध, और छह प्रकार के रसों से युक्त उत्तम भोजन उत्पन्न करती थी, जो अमृत के समान स्वादिष्ट होते थे। इसके अतिरिक्त वह पीने, खाने, चाटने और चूसने योग्य अनेक स्वादिष्ट पदार्थ, बहुमूल्य रत्न और विभिन्न प्रकार के वस्त्र भी प्रदान करती थी।
इन सब वस्तुओं से राजा का अत्यंत आदर-सत्कार किया गया। राजा और उनकी सेना अत्यंत प्रसन्न हुई।
राजा ने उस अद्भुत गौ को देखा—जिसके अंग अत्यंत सुंदर थे, बड़ी-बड़ी आँखें, ऊँचे थन, सुडौल शरीर, सीधे कान, सुंदर सींग, और सुदृढ़ गर्दन थी। वह अत्यंत अद्भुत और अनुपम थी।
गाधि के पुत्र विश्वामित्र उस गौ की प्रशंसा करते हुए ऋषि वसिष्ठ से बोले—
“हे ब्राह्मण! हे महान मुनि! आप मुझे यह नन्दिनी गौ दे दीजिए। इसके बदले मैं आपको दस हजार गौएँ या अपना पूरा राज्य दे सकता हूँ। आप मेरा राज्य स्वीकार करें।”
यह सुनकर वसिष्ठ बोले—
“हे निष्पाप! यह गौ देवताओं, अतिथियों, पितरों और यज्ञों के लिए मेरे पास है। मैं इसे तुम्हारे राज्य के बदले भी नहीं दे सकता।”
इस पर विश्वामित्र बोले—
“मैं क्षत्रिय हूँ और आप एक ब्राह्मण हैं जो तपस्या और अध्ययन में लगे रहते हैं। शांत और संयमी ब्राह्मणों में क्या शक्ति होती है? जब आप मुझे दस हजार गौओं के बदले भी यह नहीं दे रहे, तो मैं इसे बलपूर्वक ले जाऊँगा!”
वसिष्ठ ने उत्तर दिया—
“तुम बलवान क्षत्रिय हो। जो उचित समझो, वही करो।”
तब विश्वामित्र ने बलपूर्वक नन्दिनी को पकड़ लिया और उसे मारते-पीटते हुए ले जाने लगे।
निर्दोष नन्दिनी करुण स्वर में रंभाने लगी और वसिष्ठ के पास आकर खड़ी हो गई। अत्याचार सहने के बावजूद वह आश्रम छोड़ने को तैयार नहीं थी।
वसिष्ठ ने कहा—
“हे प्रिय! मैं तुम्हारी पुकार सुन रहा हूँ, परन्तु मैं एक क्षमाशील ब्राह्मण हूँ। विश्वामित्र तुम्हें बलपूर्वक ले जा रहे हैं, मैं क्या कर सकता हूँ?”
यह सुनकर नन्दिनी बोली—
“हे महर्षि! आप मुझे ऐसे क्यों छोड़ रहे हैं, मानो मेरा कोई स्वामी ही न हो? यदि आप मुझे त्याग नहीं रहे, तो मुझे कोई भी बलपूर्वक नहीं ले जा सकता!”
वसिष्ठ बोले—
“मैं तुम्हें नहीं त्याग रहा। यदि तुम रह सकती हो तो रहो। देखो, तुम्हारा बछड़ा वहाँ बंधा हुआ है।”
यह सुनते ही नन्दिनी क्रोधित हो उठी। उसकी आँखें लाल हो गईं और वह भयानक रूप धारण कर विश्वामित्र की सेना पर टूट पड़ी।
उसके शरीर से अग्नि के समान शक्ति प्रकट होने लगी। उसकी पूँछ से अग्नि वर्षा होने लगी। उसके विभिन्न अंगों से अनेक जातियों की सेनाएँ उत्पन्न हुईं—पाल्हव, शक, यवन, किरात, चीन, हूण आदि।
वह विशाल सेना विश्वामित्र की सेना पर टूट पड़ी। विश्वामित्र की सेना भयभीत होकर भागने लगी।
किन्तु वसिष्ठ की ओर से किसी का वध नहीं किया गया—केवल उन्हें खदेड़ दिया गया।
यह देखकर विश्वामित्र को अत्यंत आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा—
“क्षत्रिय बल व्यर्थ है! ब्राह्मण का तप ही सच्चा बल है!”
यह कहकर उन्होंने अपना राज्य त्याग दिया और तपस्या करने का निश्चय किया।

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