Kacha और Devayani कथा – Part 1
हिंदी (अनुवाद):
देवताओं (स्वर्गीय शक्तियों) और असुरों के बीच प्राचीन समय में तीनों लोकों की सत्ता के लिए बार-बार युद्ध होते रहते थे।
देवताओं ने विजय की इच्छा से अंगिरा के पुत्र बृहस्पति को अपना पुरोहित बनाया,
जबकि असुरों ने विद्वान शुक्राचार्य (जिन्हें उशनस्, काव्य और भार्गव भी कहा जाता है) को अपना गुरु नियुक्त किया।
इन दोनों ब्राह्मणों के बीच सदैव प्रतिस्पर्धा बनी रहती थी।
युद्ध में मारे गए दानवों को शुक्राचार्य अपनी विद्या संजीवनी से पुनर्जीवित कर देते थे, जिससे वे फिर से देवताओं से युद्ध करने लगते थे। लेकिन बृहस्पति इस विद्या को नहीं जानते थे, इसलिए वे देवताओं को पुनर्जीवित नहीं कर पाते थे। इस कारण देवता अत्यंत दुखी और चिंतित हो गए।
तब देवताओं ने बृहस्पति के पुत्र कचा से कहा— “हे कचा! हम तुम्हारी शरण में आए हैं। तुम हमारे लिए एक महान कार्य करो। शुक्राचार्य के पास जो संजीवनी विद्या है, उसे किसी भी प्रकार प्राप्त करो।”
हिंदी (अनुवाद):
कचा ने देवताओं की बात स्वीकार की और असुरों के राजा वृषपर्वा के नगर में जाकर शुक्राचार्य के पास पहुँचे।
उन्होंने विनम्रता से कहा—
“हे आचार्य! मुझे अपना शिष्य स्वीकार करें। मैं अंगिरा का पौत्र और बृहस्पति का पुत्र कचा हूँ।
मैं हजार वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए आपकी सेवा करना चाहता हूँ।”
शुक्राचार्य ने कहा— “हे कचा! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम्हें अपना शिष्य स्वीकार करता हूँ। तुम्हारी सेवा करने से मैं बृहस्पति का सम्मान करूँगा।”
इसके बाद कचा ने अपने व्रत को स्वीकार कर लिया और गुरु तथा उनकी पुत्री देवयानी की सेवा में लग गए।
हिंदी (अनुवाद):
कचा ने अपने मधुर व्यवहार, संगीत, नृत्य और सेवा से देवयानी को प्रसन्न कर लिया।
वह उसे फूल, फल और उपहार देकर खुश करते थे।
देवयानी भी कचा से स्नेह करने लगी और उनके साथ मधुर व्यवहार करती थी। दोनों के बीच गहरा संबंध बन गया।
हिंदी (अनुवाद):
कुछ समय बाद असुरों को कचा के उद्देश्य का पता चल गया।
वे क्रोधित हो गए और एक दिन जब कचा अकेले जंगल में गायें चरा रहे थे,
तो उन्होंने उसे मार डाला।
उन्होंने उसके शरीर को टुकड़ों में काटकर गीदड़ों और भेड़ियों को खिला दिया।
जब गायें बिना कचा के लौट आईं, तो देवयानी चिंतित हो गई और अपने पिता से बोली— “पिताजी! कचा दिखाई नहीं दे रहा। वह या तो खो गया है या मर गया है। मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकती।”
हिंदी (अनुवाद):
शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का प्रयोग किया और कचा को पुनर्जीवित कर दिया।
कचा जीवित होकर वापस आ गया।
उसने बताया कि असुरों ने उसे मारकर उसके शरीर के टुकड़े कर दिए थे।

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