कथा–1 : देवी दुर्गा का प्राकट्य से।
(मार्कण्डेय पुराण) — देवी दुर्गा का प्राकट्य
सृष्टि का संकट और शक्ति की आवश्यकता
सृष्टि की स्थापना के बाद जब देवता और असुरों के मध्य क्रमिक संघर्ष हुआ, तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने देखा कि अहंकार और अधर्म ने सृष्टि को अत्यंत संकट में डाल दिया है। देवताओं ने कई प्रयास किए—यज्ञ, तप, मन्त्र—परंतु यह स्पष्ट हुआ कि सृष्टि की रक्षा के लिए केवल एक दिव्य शक्ति की आवश्यकता है, जो सभी देवताओं में निहित हो।
इस समय देवताओं ने परमेश्वर ब्रह्मा के पास जाकर विनती की:
“हे ब्रह्मा! इस सृष्टि को असुरों के अत्याचार से बचाने हेतु कौन शक्ति प्रकट कर सकता है?”
ब्रह्मा ने कहा:
“केवल वही शक्ति सृष्टि की रक्षा कर सकती है, जो सब देवताओं की ऊर्जा और तत्त्वज्ञान में विलीन हो।”
ऐसे समय में देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ, जो सृष्टि के संतुलन और न्याय की प्रत्यक्ष प्रतिनिधि बनी।
देवी दुर्गा का स्वरूप और दिव्यता
देवी दुर्गा का स्वरूप अत्यंत दिव्य और भव्य था। उनके दस हाथ थे, प्रत्येक हाथ में अद्भुत शक्ति का प्रतीक अस्त्र। उनके गहनों में ज्ञान, धैर्य, करुणा और विवेक का प्रकाश था। उनके शरीर से प्रकाशमान आभा निकल रही थी, जो पूरे ब्रह्मांड को आलोकित कर रही थी।
देवी दुर्गा का प्राकट्य केवल रूप का नहीं, बल्कि सृष्टि और तत्त्व का प्रत्यक्ष दर्शन था।
| हाथ में अस्त्र | प्रतीक |
|---|---|
| त्रिशूल | त्रय: मार्ग — धर्म, न्याय, तत्त्वज्ञान |
| चक्र | शक्ति का नियंत्रित प्रयोग |
| खड्ग | अहंकार और अधर्म का विनाश |
| धनुष-बाण | संघर्ष और साहस |
| कमल | करुणा और संतुलन |
| शंख | घोषणा और चेतावनी |
| गदा | संकल्प और दृढ़ता |
| सिद्धि-साधन | ज्ञान और साधना |
| पुस्तक | शिक्षा और तत्त्वज्ञान |
| माला | ध्यान और समाधि |
उनके प्रकट होते ही असुर भयभीत हो गए, और देवता प्रसन्न हुए।
सृष्टि और शक्ति का प्रतीक
देवी दुर्गा केवल एक युद्ध की देवी नहीं थीं। उनका प्राकट्य यह दर्शाता था कि शक्ति का उपयोग केवल अहंकार और हिंसा के विनाश के लिए किया जाना चाहिए, और वैराग्य तथा करुणा के साथ होना चाहिए।
देवी दुर्गा का यह स्वरूप सिखाता है:
- सृष्टि की रक्षा केवल शक्ति से नहीं, विवेक और तत्त्वज्ञान से होती है।
- करुणा और शक्ति साथ-साथ चलनी चाहिए।
- अधर्म और अहंकार का नाश अवश्य होना चाहिए।
भक्तों के लिए संदेश
देवी दुर्गा का प्राकट्य हमें यह भी शिक्षा देता है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ केवल बाहरी संघर्ष नहीं हैं। असुर रूपी विपत्तियाँ और अहंकार रूपी बाधाएँ हमारी आंतरिक चेतना में भी आती हैं।
“जहाँ शक्ति है, वहां विवेक नहीं,
वह विनाश लाती है;
जहाँ शक्ति विवेक और करुणा के साथ है,
वह सृष्टि की रक्षा करती है।”
इस कथा के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि देवी दुर्गा का प्राकट्य, केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन और जीवन के तात्त्विक मार्गदर्शन के लिए हुआ।
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